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फर्जी IAS की परछाईं में एक मां का टूटता सपना, झोपड़ी से ठगी तक की दर्दनाक कहानी

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सीतामढ़ी/गोरखपुर। फर्जी IAS बनकर लोगों को ठगने के आरोप में गिरफ्तार गौरव कुमार सिंह उर्फ ललित किशोर राम की हकीकत सामने आते ही उसकी मां जहरी देवी का दर्द भी छलक पड़ा। टूटी आवाज, भरी आंखें और भीतर दबा गुस्सा—सब कुछ जैसे एक साथ बाहर आ गया। मां कहती हैं, “14 साल की उम्र में घर छोड़कर चला गया था। बोला—मैं कचरे में नहीं रह सकता। पिता की मौत पर भी नहीं लौटा… कोई बेटा मां से ऐसा कहता है?” इतना कहकर वह खामोश हो जाती हैं।

ललित मूल रूप से सीतामढ़ी जिले के मेहसौल थाना क्षेत्र के सुंदर नगर वार्ड संख्या-37 का रहने वाला है। यहीं एक फूस की झोपड़ी में उसका बचपन बीता। बांस और मिट्टी की दीवारें, ऊपर से बारिश रोकने के लिए काली पॉलीथीन—यही उसका घर था। पिता जूता पॉलिश कर परिवार चलाते थे, मां और भाई मजदूरी करते थे। करीब पांच साल पहले पिता की मौत हो गई, लेकिन ललित अंतिम संस्कार में भी नहीं दिखा।

मां के मुताबिक, किशोरावस्था में ही उसने घर छोड़ दिया था। पास के इलाके में एक कोचिंग चलाने लगा और वहीं रहने लगा। वह साफ कहता था कि उसे इस झोपड़ी में रहना मंजूर नहीं। धीरे-धीरे परिवार से उसका संपर्क लगभग खत्म हो गया—न फोन, न पता कि कहां है और क्या कर रहा है।

ग्रामीण बताते हैं कि पढ़ाई में ललित शुरू से तेज था। राजकीय मध्य विद्यालय मांगुराहा से आठवीं तक पढ़ाई की। बाद में बच्चों को पढ़ाने लगा। फीस भी कम रखता था—गरीब बच्चों से तो पैसे लेता ही नहीं था। कॉपी-किताब बांटना, मेधावी छात्रों को सम्मानित करना—इन कामों से उसने इलाके में एक समाजसेवी शिक्षक की छवि बना ली। इसी भरोसे पर लोग उसे चंदा देने लगे।

लेकिन 2022 के बाद तस्वीर बदलने लगी। रहन-सहन, बातचीत और तेवर सब कुछ अलग दिखने लगे। उसने खुद को गौरव कुमार सिंह बताना शुरू किया और बाहरी लोगों के सामने खुद को IAS अधिकारी के रूप में पेश करने लगा। सरकारी गाड़ियों का दिखावा, नेम प्लेट, विजिटिंग कार्ड—सब कुछ अफसरी रंग में ढल गया। उसकी भाषा और आत्मविश्वास ने कई लोगों को भरोसे में ले लिया।

ग्रामीणों का कहना है कि इस ठगी के खेल में उसके साले अभिषेक कुमार की बड़ी भूमिका थी, जो फर्जी पहचान पत्र और सरकारी कागजात तैयार करता था। ललित उसे ‘स्टेनो बाबू’ कहकर बुलाता था। इसी नेटवर्क के जरिए नौकरी, बीएड और कॉलेज में दाखिले के नाम पर लोगों से मोटी रकम ऐंठी गई।

बताया जाता है कि ठगी के पैसों से उसने फोरलेन के पास करीब एक बीघा जमीन भी खरीदी। शुरुआत बांका और भागलपुर से हुई और फिर दायरा बढ़ता चला गया। पड़ोसियों का कहना है कि ललित में काबिलियत थी, वह सचमुच अफसर बनना चाहता था, लेकिन गरीबी से नफरत और जल्दी अमीर बनने की चाह ने उसे गलत रास्ते पर धकेल दिया।

आज वह फर्जी IAS के आरोप में सलाखों के पीछे है और उधर झोपड़ी में रहने वाली मां एक ही सवाल से जूझ रही है—“कहां चूक हो गई?”
यह कहानी सिर्फ एक अपराध की नहीं, बल्कि टूटे सपनों, दबे हुए गुस्से और गलत राह चुन लेने की त्रासदी की भी है।

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