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अस्थावां प्रखंड में अविश्वास प्रस्ताव पर हाईकोर्ट ने लगाया अंतरिम रोक, सियासी सरगर्मी पर लगी ब्रेक

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नालंदा। अस्थावां प्रखंड में प्रमुख और उपप्रमुख के खिलाफ बुलायी गई विशेष बैठक पर पटना हाईकोर्ट ने बुधवार को अंतरिम रोक लगा दी। जस्टिस अनिल कुमार सिन्हा ने प्रमुख रोहित कुमार और उपप्रमुख विशुन देव सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर अपना पक्ष स्पष्ट करने और जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने 6 से 26 तक प्रतिवादी सदस्यों को नोटिस जारी किया। अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद निर्धारित की गई है।
पंचायत समिति की विशेष बैठक 27 फरवरी, 2026 को बुलायी जानी थी, जिसमें प्रमुख और उपप्रमुख के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर विचार होना था। कार्यपालक पदाधिकारी सह प्रखंड विकास पदाधिकारी ने 19 फरवरी को बैठक का आदेश जारी किया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह आदेश बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 की धारा 44(3)(1) के तहत अनुचित है। अधिनियम में स्पष्ट किया गया है कि अविश्वास प्रस्ताव पर बैठक बुलाने का प्राथमिक अधिकार प्रमुख का होता है, और केवल 15 दिनों के भीतर यदि प्रमुख बैठक नहीं बुलाते हैं, तब उपप्रमुख या एक-तिहाई सदस्य बैठक तिथि तय कर सकते हैं।
याचिकाकर्ताओं के वकील ने कोर्ट को बताया कि BDO द्वारा सीधे 27 फरवरी की बैठक तिथि तय करना कानून के अधिकार क्षेत्र के बाहर था। इस आधार पर अदालत ने अंतरिम रोक लगाते हुए मामले की अगली सुनवाई तक कोई कार्रवाई रोक दी।
राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से यह मामला काफी संवेदनशील माना जा रहा है। स्थानीय राजनैतिक सूत्रों का कहना है कि अविश्वास प्रस्ताव को लेकर प्रखंड स्तर पर तनाव बढ़ रहा था। विरोधी गुटों ने दावा किया कि यदि बैठक होती, तो सियासी समीकरण और स्थानीय सत्ता का संतुलन प्रभावित होता।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद अस्थावां प्रखंड में फिलहाल सियासी गतिविधियों पर अस्थायी विराम लग गया है। विशेषज्ञों के अनुसार यह मामला पंचायतों में अविश्वास प्रस्ताव के अधिकार क्षेत्र और कार्यपालक पदाधिकारियों की सीमाओं को लेकर न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।
वहीं, राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि राज्य सरकार अब इस मामले में स्पष्ट जवाब देने और प्रखंड प्रशासन के आदेशों का उचित न्यायिक मूल्यांकन सुनिश्चित करने में जुटी है। आगामी सुनवाई में अदालत अविश्वास प्रस्ताव की वैधता और BDO के आदेश की कानूनी औचित्यता का निर्णय दे सकती है।
इस मामले में सबकी निगाहें अब राज्य सरकार की प्रतिक्रिया और हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जो स्थानीय राजनीतिक परिदृश्य और पंचायत संचालन के भविष्य के लिए निर्णायक साबित हो सकती है।

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