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नीतीश कुमार की राजनीति का रंगमंच: पलटी-बाजी और मास्टर स्ट्रोक से बिहार को चौंकाते चार दशक

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पटना:
बिहार की राजनीति इस समय एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। मुख्यमंत्री Nitish Kumar ने गुरुवार को स्वयं घोषणा की कि वे इस बार राज्यसभा चुनाव लड़ेंगे। इस कदम ने राज्य और देश की राजनीति में हलचल मचा दी है। करीब दो दशक तक लगातार मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार का यह फैसला बिहार में सत्ता और राजनीतिक समीकरणों के लिए एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।
नीतीश कुमार ने अपने बयान में कहा कि पिछले 20 वर्षों से बिहार की जनता ने उन पर भरोसा रखा और उसी भरोसे के दम पर उन्होंने राज्य की सेवा की। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संसदीय जीवन के आरंभ से ही उनकी इच्छा थी कि वे विधानसभा और संसद के दोनों सदनों के सदस्य बनें। उनके इस फैसले ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा का मार्ग खोल दिया है, जहां अब अनुमान लगाया जा रहा है कि नई सरकार बनने के बाद भी नीतीश कुमार मार्गदर्शक की भूमिका निभाते रहेंगे।
नीतीश कुमार की सियासी यात्रा चार दशकों से अधिक लंबी रही है। उन्होंने 1970 के दशक में आपातकाल के खिलाफ आंदोलन के दौरान राजनीति में कदम रखा और 1985 में जनता दल से बिहार विधानसभा का चुनाव जीतकर विधायिका में प्रवेश किया। 1994 में उन्होंने वरिष्ठ समाजवादी नेता George Fernandes के साथ मिलकर समता पार्टी बनाई, और 1996 में इस पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीतकर राष्ट्रीय राजनीति में पहचान बनाई।
1998 से 2004 तक उन्होंने Atal Bihari Vajpayee के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में रेल और सड़क परिवहन जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार संभाला। साल 2000 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने, हालांकि बहुमत न होने के कारण कुछ ही दिनों में इस्तीफा देना पड़ा। 2003 में समता पार्टी का विलय जनता दल यूनाइटेड में हुआ और 2005 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू और बीजेपी गठबंधन ने राष्ट्रीय जनता दल का 15 साल का शासन समाप्त कर दिया।
नीतीश कुमार ने अपने करियर में कई बड़े राजनीतिक मोड़ लिए। 2013 में उन्होंने बीजेपी से अलग होने का निर्णय लिया, 2015 में महागठबंधन का गठन किया, 2017 में एनडीए में वापसी की और 2020 में सत्ता में लौटे। 2022 में उन्होंने फिर महागठबंधन बनाया और कुछ समय बाद फिर बीजेपी के साथ मिलकर नौवीं बार मुख्यमंत्री बने।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि राज्यसभा जाने का यह कदम केवल पद परिवर्तन नहीं है, बल्कि बिहार में सत्ता संरचना और नेतृत्व की दिशा में एक नया अध्याय खोलने जैसा है। नीतीश कुमार की केंद्र की ओर बढ़ती भूमिका नए सियासी समीकरणों और नेतृत्व परिवर्तन की संभावना को बढ़ावा दे रही है।
नीतीश कुमार का हर कदम चार दशकों की राजनीतिक परंपरा और अनुभव से प्रेरित रहा है। चाहे सत्ता परिवर्तन हो या गठबंधन की राजनीति, उनका निर्णय हमेशा चर्चा का विषय रहा है। अब राज्यसभा की ओर उनका यह कदम बिहार की राजनीति में नए अध्याय की शुरुआत कर रहा है, जहां उनका मार्गदर्शन और अनुभव नए नेतृत्व और राजनीतिक रणनीतियों को आकार देंगे।
इस ऐतिहासिक मोड़ के साथ बिहार की सियासत की निगाहें यह देखने पर टिक गई हैं कि राज्य और केंद्र की राजनीति में नीतीश कुमार की भूमिका अब किस रूप में सामने आएगी, और नई पीढ़ी के नेताओं के लिए यह कौन से नए अवसर और चुनौती लेकर आएगा।

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