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नीतीश के बाद निशांत को सीएम बनाने की मांग, आनंद मोहन ने NDA को दी नई सलाह
- Reporter 12
- 04 Apr, 2026
बिहार की राजनीति में नई हलचल के बीच पूर्व सांसद आनंद मोहन ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दिल्ली जाने की चर्चा पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने निशांत कुमार को उपमुख्यमंत्री नहीं, बल्कि पूर्णकालिक मुख्यमंत्री बनाने की वकालत की है।
पटना आलम की खबर।शिवहर: बिहार की राजनीति में इन दिनों हलचल कुछ ज्यादा ही तेज हो गई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा पहुंचने के बाद अब उनके आगे की राजनीतिक भूमिका को लेकर अटकलें और चर्चाएं दोनों तेज हैं। इसी बीच पूर्व सांसद आनंद मोहन ने एक बार फिर ऐसा बयान दिया है, जिसने NDA, खासकर जदयू और भाजपा के भीतर नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। दिल्ली और पटना के बाद अब शिवहर में भी उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यदि नीतीश कुमार बिहार की सक्रिय राजनीति से हटते हैं या दिल्ली की भूमिका में जाते हैं, तो उसके बाद राज्य के कई सामाजिक और राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। आनंद मोहन का यह बयान ऐसे समय आया है, जब बिहार में नेतृत्व के अगले चेहरे को लेकर भी अलग-अलग स्तर पर चर्चाएं तेज हो रही हैं।
आनंद मोहन ने इशारों-इशारों में जदयू और भाजपा के उन नेताओं पर भी निशाना साधा, जो यह मानकर चल रहे हैं कि नीतीश कुमार के दिल्ली जाने से बिहार की राजनीति में कोई बड़ा संकट नहीं पैदा होगा। उन्होंने कहा कि यदि कोई यह सोच रहा है कि नीतीश कुमार को बिहार से हटाकर बहुत बड़ी राजनीतिक उपलब्धि हासिल कर ली जाएगी, तो यह आकलन बेहद गलत साबित हो सकता है। उनके मुताबिक, नीतीश कुमार सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में एक स्थापित सामाजिक-सियासी संतुलन का चेहरा रहे हैं। ऐसे में अगर उन्हें अचानक किनारे किया जाता है, तो इसका असर केवल जदयू तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भाजपा को भी इसका राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
‘नीतीश के बाद ही समझ आएगी उनकी अहमियत’
शिवहर में मीडिया से बातचीत के दौरान आनंद मोहन ने कहा कि जब तक नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में सक्रिय हैं, तब तक बहुत से लोग उनकी असली राजनीतिक उपयोगिता को शायद पूरी तरह नहीं समझ रहे। लेकिन अगर वे दिल्ली की राजनीति में चले जाते हैं या बिहार की कमान छोड़ते हैं, तब राज्य के कई वर्गों—खासकर सवर्णों, पिछड़ों, अतिपिछड़ों और मुस्लिमों—को यह महसूस होगा कि नीतीश कुमार का राजनीतिक महत्व वास्तव में कितना बड़ा था। उन्होंने संकेत दिया कि बिहार में कई सामाजिक समूहों का भरोसा और संतुलन काफी हद तक नीतीश कुमार की मौजूदगी से जुड़ा रहा है।
आनंद मोहन ने यह भी कहा कि बिहार की राजनीति में अतिपिछड़ा वर्ग का जो समर्थन NDA को मिलता रहा, उसमें सबसे बड़ी भूमिका नीतीश कुमार की रही है। उनके मुताबिक यह वोट बैंक सीधे तौर पर भाजपा का नहीं, बल्कि नीतीश कुमार के नेतृत्व पर भरोसा करने वाला सामाजिक आधार रहा है। ऐसे में यदि नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया बिना राजनीतिक संवेदनशीलता के आगे बढ़ाई जाती है, तो इसका असर चुनावी समीकरणों पर भी साफ दिखाई दे सकता है। उन्होंने यह साफ संकेत दिया कि इस पूरे मामले पर भाजपा को विशेष गंभीरता से विचार करना चाहिए, क्योंकि दीर्घकाल में इसका असर सहयोगी दलों के रिश्तों और सामाजिक समर्थन दोनों पर पड़ सकता है।
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निशांत कुमार को सीएम बनाने की खुली पैरवी
अपने बयान में आनंद मोहन ने सबसे ज्यादा चर्चा तब बटोरी, जब उन्होंने निशांत कुमार को बिहार की राजनीति में आगे लाने की खुलकर वकालत की। उन्होंने कहा कि अगर भविष्य में नेतृत्व परिवर्तन की नौबत आती है, तो निशांत कुमार को केवल उपमुख्यमंत्री बनाकर सीमित भूमिका देना उचित नहीं होगा। उनके मुताबिक, अगर उन्हें जिम्मेदारी दी जाती है, तो उन्हें सीधे पूर्णकालिक मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए। आनंद मोहन का मानना है कि ऐसा कदम न सिर्फ जनभावना के अनुरूप होगा, बल्कि इससे जदयू के भीतर स्थिरता भी आएगी और समर्थकों के बीच एक स्पष्ट संदेश जाएगा।
उन्होंने यह भी कहा कि अभी से ही कई नेता अपने-अपने स्तर पर भविष्य की राजनीतिक जमीन तलाशने लगे हैं। उनके मुताबिक, जैसे-जैसे यह चर्चा तेज हो रही है कि नीतीश कुमार की भूमिका बदल सकती है, वैसे-वैसे पार्टी और गठबंधन के भीतर भी बेचैनी बढ़ रही है। आनंद मोहन ने दावा किया कि पिछड़ा, अतिपिछड़ा और अल्पसंख्यक समाज के बीच इस समय असमंजस और चिंता का माहौल है। उन्होंने कहा कि इन वर्गों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि यदि नीतीश कुमार की सक्रिय भूमिका कम होती है, तो आगे उनकी राजनीतिक आवाज और सुरक्षा किसके हाथ में होगी।
NDA के भीतर नई बहस की शुरुआत
आनंद मोहन के इस बयान ने केवल एक राजनीतिक राय भर नहीं दी, बल्कि NDA की आंतरिक राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। एक तरफ यह बयान जदयू के नेतृत्व और भविष्य को लेकर सवाल खड़े करता है, तो दूसरी तरफ भाजपा के लिए भी यह संकेत छोड़ता है कि बिहार में केवल गणित से राजनीति नहीं चलेगी। यहां चेहरे, सामाजिक भरोसा और नेतृत्व की स्वीकृति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि आनंद मोहन के इस बयान को गठबंधन के भीतर किस नजर से देखा जाता है और क्या यह सिर्फ एक निजी राय बनकर रह जाएगा या फिर सचमुच बिहार की राजनीति में किसी बड़े बदलाव की भूमिका तैयार करेगा।
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