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लोकसभा सीटें 543 से 816 करने के प्रस्ताव पर पी. चिदंबरम का तीखा विरोध

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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 करने के प्रस्ताव और संसद का विशेष सत्र बुलाने की चर्चा पर कड़ा एतराज जताया है। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और विपक्ष की भागीदारी पर असर डालने वाला कदम बताया।

नई दिल्ली/आलम की खबर:कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने लोकसभा की कुल सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 किए जाने की संभावित योजना पर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि इतनी बड़ी लोकसभा देश की संसदीय कार्यप्रणाली को और अधिक जटिल, बोझिल और कम प्रभावी बना देगी। उनके मुताबिक, संसद का निचला सदन यदि इस स्तर तक विस्तार कर दिया जाता है, तो सांसदों की वास्तविक भूमिका सीमित हो जाएगी और आम जनता के मुद्दे सदन के भीतर पर्याप्त तरीके से उठ ही नहीं पाएंगे। रविवार को जारी अपने बयान में चिदंबरम ने कहा कि लोकतंत्र सिर्फ सीटों की संख्या बढ़ाने से मजबूत नहीं होता, बल्कि यह सुनिश्चित करने से मजबूत होता है कि चुने गए प्रतिनिधियों को बोलने, बहस करने और जनता की समस्याएं रखने का वास्तविक अवसर मिले।

चिदंबरम ने इस प्रस्ताव के सबसे गंभीर पहलू की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि अगर लोकसभा में सदस्यों की संख्या 800 से अधिक हो जाती है, तो बहस की गुणवत्ता और प्रत्येक सांसद की उपयोगिता पर सीधा असर पड़ेगा। उन्होंने सवाल उठाया कि जब किसी सांसद को तीन-तीन महीने में केवल कुछ मिनट बोलने का मौका मिलेगा, तब वह अपने क्षेत्र की समस्याओं, जनता की मांगों और स्थानीय मुद्दों को किस प्रभावशीलता के साथ राष्ट्रीय मंच पर रख पाएगा। उनका कहना था कि संसद कोई औपचारिक उपस्थिति दर्ज कराने का मंच नहीं है, बल्कि यह देश की नीतियों, जनता की आवाज और लोकतांत्रिक बहस का सबसे बड़ा केंद्र है। ऐसे में यदि सांसदों की संख्या तो बढ़ा दी जाए, लेकिन उनकी भागीदारी का दायरा सिकुड़ जाए, तो यह लोकतंत्र के उद्देश्य के ही विपरीत होगा।

उन्होंने 16 से 18 अप्रैल के बीच संसद का विशेष सत्र बुलाए जाने की चर्चाओं पर भी सवाल खड़े किए। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि इस विशेष सत्र के दौरान डिलिमिटेशन (परिसीमन) को मंजूरी देने और महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के लिए संविधान संशोधन विधेयक लाया जा सकता है। चिदंबरम ने इस संभावित समय-निर्धारण को “शरारतपूर्ण कदम” करार देते हुए कहा कि इस तरह के बड़े संवैधानिक और राजनीतिक महत्व के फैसले ऐसे समय में नहीं लिए जाने चाहिए, जब देश के कई महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव जारी हों। उनका कहना था कि यदि किसी प्रस्ताव का लोकतांत्रिक आधार मजबूत है, तो उसे जल्दबाजी और रणनीतिक समय-चयन के जरिए आगे बढ़ाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

चिदंबरम ने अपने बयान में चुनावी कार्यक्रम का जिक्र करते हुए कहा कि इस समय देश के कई हिस्सों में राजनीतिक गतिविधियां अपने चरम पर हैं। विशेष रूप से तमिलनाडु में 23 अप्रैल को मतदान होना है, जबकि पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को वोटिंग प्रस्तावित है। उन्होंने कहा कि इन दोनों राज्यों से जुड़े कुल 67 सांसद विपक्षी खेमे में हैं और स्वाभाविक रूप से वे अपने-अपने राज्यों में चुनाव प्रचार और राजनीतिक दायित्वों में व्यस्त रहेंगे। ऐसे में यदि इन तारीखों के बीच संसद का विशेष सत्र बुलाया जाता है, तो बड़ी संख्या में विपक्षी सांसद सदन में उपस्थित नहीं हो पाएंगे। चिदंबरम ने इस स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब चुनावी प्रक्रिया 29 अप्रैल तक पूरी हो जानी है, तो संसद का विशेष सत्र उसके बाद बुलाने में आखिर क्या दिक्कत है।

उन्होंने आशंका जताई कि इस तरह का समय चयन केवल संयोग नहीं भी हो सकता है। उनके अनुसार, यदि इतने महत्वपूर्ण विधायी और संवैधानिक विषयों पर चर्चा उस समय कराई जाती है, जब विपक्ष के प्रमुख सांसद चुनावी कारणों से अनुपस्थित हों, तो यह लोकतांत्रिक निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है। चिदंबरम ने इशारों-इशारों में यह भी कहा कि यह विपक्षी आवाजों को चर्चा और मतदान की प्रक्रिया से दूर रखने की रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। उनका कहना था कि संविधान में बड़े बदलाव और संसद की संरचना से जुड़े फैसले ऐसे माहौल में होने चाहिए, जहां सभी पक्ष पूरी तैयारी और पर्याप्त उपस्थिति के साथ भाग ले सकें।

लोकसभा सीटों के विस्तार के प्रस्ताव को लेकर चिदंबरम ने एक और महत्वपूर्ण राजनीतिक और क्षेत्रीय चिंता सामने रखी। उन्होंने कहा कि यदि लोकसभा की सीटों की संख्या केवल आबादी के आधार पर बड़े पैमाने पर बढ़ाई जाती है, तो इससे देश के विभिन्न हिस्सों के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन बिगड़ सकता है। विशेष तौर पर उन्होंने दक्षिण भारत के उन राज्यों की चिंता जताई, जहां लंबे समय से जनसंख्या नियंत्रण और सामाजिक विकास के कारण जनसंख्या वृद्धि अपेक्षाकृत स्थिर रही है। उनका कहना था कि यदि सीटों का विस्तार सिर्फ जनसंख्या के अनुपात में किया गया, तो ज्यादा आबादी वाले राज्यों का प्रभाव और बढ़ जाएगा, जबकि दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी तुलनात्मक रूप से कमजोर पड़ सकती है।

चिदंबरम के अनुसार, यह केवल सीटों का तकनीकी मामला नहीं है, बल्कि यह संघीय संतुलन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और राष्ट्रीय शक्ति-संतुलन से जुड़ा सवाल है। उन्होंने संकेत दिया कि परिसीमन और सीटों के पुनर्विन्यास का कोई भी कदम बहुत सोच-समझकर, व्यापक सहमति के साथ और देश के सभी क्षेत्रों की संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखकर ही उठाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संसद की प्रभावशीलता और राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन, दोनों ही भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी शर्तें हैं।

महिला आरक्षण के मुद्दे पर भी चिदंबरम ने अलग और स्पष्ट रुख सामने रखा। उन्होंने कहा कि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का उद्देश्य पूरी तरह उचित और स्वागतयोग्य है, लेकिन इसके लिए लोकसभा की कुल सीटों की संख्या बढ़ाना जरूरी नहीं है। उनके मुताबिक, मौजूदा 543 सीटों में से ही एक-तिहाई सीटों को आरक्षित कर इस प्रावधान को लागू किया जा सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने का सवाल सीटों के विस्तार से नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और विधायी निर्णय से जुड़ा है। यदि सरकार सचमुच महिला आरक्षण लागू करना चाहती है, तो उसके लिए सीटों की संख्या बढ़ाने जैसी विवादास्पद प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए।

राजनीतिक हलकों में चिदंबरम के इस बयान को आने वाले दिनों की बड़ी संसदीय और चुनावी बहस का संकेत माना जा रहा है। लोकसभा सीटों के विस्तार, परिसीमन, महिला आरक्षण और संसद के विशेष सत्र को लेकर जो चर्चा शुरू हुई है, वह आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकती है। फिलहाल, चिदंबरम ने अपने बयान के जरिए यह साफ कर दिया है कि विपक्ष इन प्रस्तावों को केवल तकनीकी बदलाव के रूप में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व, राजनीतिक संतुलन और संसदीय गरिमा से जुड़े गंभीर प्रश्न के रूप में देख रहा है।

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