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पटना में गहराया एलपीजी संकट, 6 दिनों में 21 हजार से ज्यादा बढ़ा बैकलॉग, गैस के लिए लंबा इंतजार

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पटना में एलपीजी गैस संकट गंभीर होता जा रहा है। 6 दिनों में सिलेंडरों का बैकलॉग 21 हजार से ज्यादा बढ़कर 1.63 लाख के पार पहुंच गया है। गैस डिलीवरी में देरी, लंबी लाइनें और प्रशासन की सख्ती के बीच पढ़िए पूरी रिपोर्ट।

पटना/आलम की खबर: राजधानी पटना में एलपीजी गैस की किल्लत अब महज अस्थायी परेशानी नहीं, बल्कि एक बड़े शहरी संकट का रूप लेती दिखाई दे रही है। शहर में घरेलू गैस सिलेंडरों की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हो चुकी है और इसका सीधा असर लाखों उपभोक्ताओं की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है। स्थिति इस हद तक बिगड़ चुकी है कि जो सिलेंडर पहले बुकिंग के दो या तीन दिनों के भीतर घर पहुंच जाता था, उसके लिए अब लोगों को एक हफ्ते से भी ज्यादा इंतजार करना पड़ रहा है। कई इलाकों में यह इंतजार 10 दिनों तक पहुंच गया है।

पटना में एलपीजी सप्लाई सिस्टम पर बढ़ते दबाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज छह दिनों के भीतर सिलेंडरों का बैकलॉग 21 हजार से अधिक बढ़ गया। पहले से ही दबाव झेल रही वितरण व्यवस्था अब लगभग चरमराने की स्थिति में दिखाई दे रही है। एजेंसियों के बाहर सुबह से ही उपभोक्ताओं की लंबी कतारें, फोन पर लगातार शिकायतें और बुकिंग के बाद डिलीवरी में हो रही देरी ने लोगों की परेशानी और नाराजगी दोनों बढ़ा दी है।

आपूर्ति व्यवस्था बिखरी, उपभोक्ता बेहाल

पटना में गैस संकट का सबसे बड़ा असर आम परिवारों पर पड़ा है। घरेलू रसोई का सबसे जरूरी ईंधन जब समय पर न पहुंचे, तो परेशानी सीधे घर-घर तक पहुंचती है। जिन परिवारों के पास सिर्फ एक ही सिलेंडर है, उनके लिए यह स्थिति और अधिक कठिन हो गई है। कई उपभोक्ता ऐसे हैं, जिन्हें गैस खत्म होने के बाद पड़ोसियों या रिश्तेदारों के सहारे खाना बनाना पड़ रहा है।

शहर के कई हिस्सों में उपभोक्ताओं का कहना है कि बुकिंग के बाद भी डिलीवरी की कोई निश्चित समय-सीमा नहीं बताई जा रही। गैस एजेंसियों पर फोन करने पर स्पष्ट जवाब नहीं मिल रहा और डिलीवरी स्टाफ भी बढ़ते दबाव के बीच जवाब देने की स्थिति में नहीं है। ऐसे हालात में लोगों का गुस्सा अब खुलकर सामने आने लगा है।

सिर्फ 6 दिनों में बैकलॉग ने पार किया 1.63 लाख का आंकड़ा

इस पूरे संकट की गंभीरता आंकड़ों से और साफ होती है। महीने की शुरुआत में जो बैकलॉग पहले से मौजूद था, वह कुछ ही दिनों में तेजी से बढ़ गया। 1 अप्रैल को जहां लंबित सिलेंडरों की संख्या लगभग 1.42 लाख के आसपास थी, वहीं 6 अप्रैल तक यह बढ़कर 1.63 लाख से ऊपर पहुंच गई। यानी छह दिनों में 21 हजार से ज्यादा अतिरिक्त सिलेंडर लंबित हो गए।

यह आंकड़ा साफ बताता है कि मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर लगातार चौड़ा होता जा रहा है। एक तरफ बुकिंग तेजी से बढ़ रही है, दूसरी तरफ आपूर्ति उस रफ्तार से नहीं हो पा रही, जिसकी शहर को जरूरत है। यही वजह है कि बैकलॉग खत्म होने के बजाय हर दिन और बढ़ता जा रहा है।

बुकिंग हो रही हजारों में, लेकिन सप्लाई बेहद सीमित

स्थिति की गंभीरता का एक और बड़ा संकेत यह है कि रोजाना बड़ी संख्या में उपभोक्ता गैस बुक कर रहे हैं, लेकिन डिलीवरी का आंकड़ा उससे काफी पीछे चल रहा है। सोमवार को ही 30 हजार से ज्यादा उपभोक्ताओं ने गैस सिलेंडर की बुकिंग कराई, लेकिन इसके मुकाबले आपूर्ति बेहद कम रही। इससे यह साफ हो गया कि मौजूदा सप्लाई सिस्टम शहर की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं रह गया है।

सबसे ज्यादा चिंता की बात यह रही कि कुछ प्रमुख तेल कंपनियों की ओर से उस दिन एक भी सिलेंडर की आपूर्ति नहीं हो सकी। वहीं दूसरी ओर सीमित संख्या में पहुंचे सिलेंडरों से स्थिति संभलने के बजाय और तनावपूर्ण हो गई। इसका असर सीधा एजेंसियों, डिलीवरी नेटवर्क और उपभोक्ताओं पर पड़ा।

प्रशासन हरकत में, मुख्य सचिव ने बुलाई आपात बैठक

एलपीजी संकट की गंभीरता को देखते हुए अब सरकार और प्रशासन भी सक्रिय हो गया है। राजधानी में बढ़ती शिकायतों और बिगड़ती स्थिति के बीच मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत ने सोमवार को क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप की आपात बैठक बुलाई। इस बैठक में तेल कंपनियों के प्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों को साफ संदेश दिया गया कि आम लोगों की परेशानी को किसी भी हालत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

मुख्य सचिव ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि गैस बैकलॉग को जल्द से जल्द कम करने के लिए ठोस और त्वरित कदम उठाए जाएं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आपूर्ति तंत्र में मौजूद कमियों को अब किसी बहाने से नहीं टाला जा सकता। प्रशासन का रुख अब यह है कि सप्लाई चेन को मिशन मोड में सुधारना होगा, वरना स्थिति और गंभीर हो सकती है।

पीएनजी योजना पर भी सरकार की नजर

एलपीजी संकट ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बड़े शहरों में घरेलू गैस की निर्भरता को धीरे-धीरे पाइप गैस की ओर नहीं मोड़ा जाना चाहिए। इसी को देखते हुए सरकार अब पीएनजी यानी पाइप्ड नेचुरल गैस कनेक्शन बढ़ाने पर भी जोर दे रही है। लक्ष्य यह है कि भविष्य में घर-घर पाइपलाइन के जरिए गैस पहुंचाई जाए, ताकि सिलेंडरों पर निर्भरता कम हो और इस तरह के संकट से राहत मिल सके।

इसके लिए तकनीकी स्तर पर भी तैयारी की जा रही है। आईटीआई के छात्रों और प्लंबरों को विशेष प्रशिक्षण देने की पहल शुरू की गई है, ताकि पाइपलाइन कनेक्शन का काम तेज हो सके। हालांकि यह एक दीर्घकालिक समाधान है, लेकिन मौजूदा संकट ने इसकी जरूरत को और ज्यादा स्पष्ट कर दिया है।

घरेलू सिलेंडरों की कालाबाजारी और व्यावसायिक इस्तेमाल पर शिकंजा

एक तरफ आम लोग गैस के लिए परेशान हैं, तो दूसरी ओर घरेलू सिलेंडरों के अवैध और व्यावसायिक इस्तेमाल की शिकायतें भी सामने आ रही हैं। प्रशासन ने इसी को लेकर सोमवार को शहर के 16 अलग-अलग स्थानों पर छापेमारी की। इस कार्रवाई में छह गैस एजेंसियां भी जांच के दायरे में आईं।

जांच के दौरान दो होटलों पर घरेलू गैस सिलेंडरों का व्यावसायिक इस्तेमाल पाए जाने के बाद उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई। प्रशासन का कहना है कि घरेलू सिलेंडरों की कालाबाजारी और अवैध उपयोग सप्लाई संकट को और बढ़ा रहा है। अब तक की कार्रवाई में कुल 22 एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं और 121 सिलेंडर जब्त किए गए हैं।

यह कार्रवाई इस बात का संकेत है कि प्रशासन अब सिर्फ सप्लाई बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि उपलब्ध संसाधनों के सही उपयोग को सुनिश्चित करने पर भी जोर दे रहा है।

संकट की असली मार आम रसोई पर

एलपीजी संकट का सबसे बड़ा असर उन घरों पर पड़ता है, जहां रोजमर्रा का खाना पूरी तरह गैस सिलेंडर पर निर्भर है। कई मध्यमवर्गीय और निम्न आय वाले परिवारों के लिए गैस खत्म होने का मतलब सीधा रसोई ठप हो जाना है। ऐसे में लगातार बढ़ता इंतजार, बुकिंग के बाद अनिश्चित डिलीवरी और एजेंसियों पर भीड़ लोगों की मुश्किलें बढ़ा रही है।

यह संकट सिर्फ आपूर्ति का मामला नहीं, बल्कि शहरी जीवन की बुनियादी जरूरतों से जुड़ा सवाल बन चुका है। जब रसोई का ईंधन समय पर न पहुंचे, तो उसका असर परिवार की दिनचर्या, बच्चों के भोजन और बुजुर्गों की जरूरतों तक महसूस होता है।

निष्कर्ष

पटना में एलपीजी गैस की मौजूदा स्थिति साफ तौर पर यह बता रही है कि शहर की सप्लाई व्यवस्था पर असामान्य दबाव है और हालात को सामान्य करने के लिए सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि तेज और ठोस कार्रवाई की जरूरत है। छह दिनों में 21 हजार से ज्यादा बढ़ा बैकलॉग, 10 दिन तक पहुंचा इंतजार और सीमित आपूर्ति इस संकट की गंभीरता को साफ कर रहे हैं।

अब देखना यह होगा कि प्रशासनिक सख्ती, तेल कंपनियों की जवाबदेही और वैकल्पिक गैस व्यवस्था को बढ़ाने की कोशिशें कितनी जल्दी असर दिखाती हैं। फिलहाल पटना की जनता की नजर एक ही सवाल पर टिकी है—गैस कब मिलेगी और हालात कब सुधरेंगे?

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