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बिहार में जनगणना ड्यूटी पर तैनात कर्मियों को बड़ी राहत, मार्च 2027 तक नहीं होगा ट्रांसफर

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Bihar Government: जनगणना ड्यूटी वाले कर्मियों के ट्रांसफर पर रोक, मार्च 2027 तक लागू रहेगा आदेश

पटना/आलम की खबर:बिहार में जनगणना की तैयारियों ने अब प्रशासनिक स्तर पर पूरी रफ्तार पकड़ ली है। राज्य सरकार ने साफ कर दिया है कि जिन सरकारी कर्मियों और अधिकारियों की जिम्मेदारी जनगणना कार्य से जुड़ी है, उन्हें बीच प्रक्रिया में इधर-उधर नहीं किया जाएगा। यही वजह है कि ऐसे कर्मियों के तबादले और पदस्थापन पर अगले साल मार्च तक रोक लगाने का फैसला लिया गया है। सरकार का मानना है कि इतने बड़े और संवेदनशील राष्ट्रीय कार्य के दौरान यदि लगातार कर्मियों का स्थानांतरण होता रहा, तो फील्ड स्तर पर काम की गति और शुद्धता दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

यह फैसला ऐसे समय आया है, जब देश में डिजिटल जनगणना की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और बिहार भी अब इस बड़े अभियान के लिए पूरी तरह तैयार दिख रहा है। इस बार की जनगणना पारंपरिक पद्धति से आगे बढ़कर तकनीक आधारित व्यवस्था के साथ कराई जा रही है। ऐसे में प्रशासन चाहता है कि जो अधिकारी और कर्मचारी इस काम में लगाए गए हैं, वे पूरी अवधि तक उसी जिम्मेदारी पर बने रहें, ताकि डेटा संग्रह, सत्यापन और अपलोडिंग की प्रक्रिया बिना रुकावट पूरी हो सके। केंद्र की ओर से राज्यों को जारी दिशा-निर्देशों के बाद बिहार में भी इस पर अमल तेज कर दिया गया है। �

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क्यों लगाई गई ट्रांसफर पर रोक?

सरकार की सबसे बड़ी चिंता यह है कि जनगणना जैसा काम निरंतरता मांगता है। इसमें एक-एक घर, परिवार, मकान, सुविधाओं और आबादी से जुड़ी जानकारी बेहद व्यवस्थित तरीके से दर्ज की जाती है। अगर बीच में संबंधित कर्मचारी या अधिकारी का तबादला हो जाए, तो नई तैनाती वाले कर्मी को फील्ड, रिकॉर्ड, स्थानीय स्थिति और प्रक्रिया समझने में समय लगेगा। इससे न केवल काम की गति धीमी होगी, बल्कि आंकड़ों की शुद्धता पर भी असर पड़ सकता है।

इसी कारण राज्य सरकार ने यह तय किया है कि जो भी अधिकारी या कर्मचारी जनगणना से जुड़ी ड्यूटी में हैं, उन्हें इस पूरी अवधि के दौरान स्थिर रखा जाए। प्रशासनिक दृष्टि से यह फैसला बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि जनगणना केवल कागजी प्रक्रिया नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की सरकारी योजनाओं, बजट, विकास और सामाजिक नीति की बुनियाद होती है। ऐसे में सरकार कोई जोखिम लेने के मूड में नहीं दिख रही।

बिहार में कब शुरू होगी स्वगणना?

इस बार जनगणना में लोगों को खुद अपनी जानकारी ऑनलाइन भरने का विकल्प भी दिया जा रहा है, जिसे “स्वगणना” कहा जा रहा है। बिहार में इसकी शुरुआत 17 अप्रैल से होने की तैयारी है। इसका मतलब यह होगा कि लोग अपने घर बैठे ही पोर्टल के जरिए परिवार की जानकारी दर्ज कर सकेंगे। यह व्यवस्था खासकर शहरी और तकनीक से जुड़े परिवारों के लिए काफी उपयोगी मानी जा रही है, क्योंकि इससे घर-घर प्रारंभिक जानकारी पहले ही सिस्टम में पहुंच जाएगी। बिहार के लिए 17 अप्रैल से स्वगणना विंडो शुरू होने की बात पहले भी आधिकारिक स्तर पर बताई गई थी। �

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स्वगणना का मकसद सिर्फ सुविधा देना नहीं, बल्कि प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और तेज बनाना भी है। लोग स्वयं अपनी मूल जानकारी भरेंगे, जिससे बाद में फील्ड में आने वाले कर्मियों को सत्यापन में आसानी होगी। इससे डाटा एंट्री की गलतियां भी कम होने की उम्मीद है। प्रशासन इसे डिजिटल गवर्नेंस की दिशा में बड़ा कदम मान रहा है।

घर-घर जाकर होगी जानकारी की पुष्टि

ऑनलाइन स्वगणना के बाद प्रक्रिया यहीं खत्म नहीं होगी। इसके बाद सरकारी कर्मी घर-घर जाकर जानकारी का सत्यापन करेंगे। यानी यदि किसी परिवार ने पोर्टल पर पहले ही डिटेल भर दी है, तब भी फील्ड कर्मी मौके पर पहुंचकर उसे मिलान करेंगे। इस पूरी प्रक्रिया का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कोई परिवार छूट न जाए और अपलोड की गई जानकारी वास्तविक स्थिति से मेल खाती हो।

घर-घर सत्यापन की यह प्रक्रिया जनगणना का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। कई बार ऑनलाइन जानकारी भरते समय छोटी-मोटी गलतियां रह जाती हैं, या परिवार की संरचना, घर की स्थिति और सुविधाओं से जुड़ी चीजें मौके पर जाकर ही ठीक तरह समझ में आती हैं। इसलिए डिजिटल और फील्ड—दोनों मॉडल को मिलाकर यह व्यवस्था बनाई गई है।

स्वगणना के लिए क्या रखना होगा तैयार?

जो लोग खुद अपनी जानकारी ऑनलाइन भरना चाहते हैं, उनके लिए सबसे जरूरी चीज होगी—मोबाइल नंबर। परिवार के किसी एक सदस्य का सक्रिय मोबाइल नंबर इस प्रक्रिया में उपयोगी होगा। इसी के आधार पर पंजीकरण, सत्यापन और आगे की डिजिटल प्रक्रिया पूरी की जाएगी। जानकारी जमा करने के बाद एक विशेष आईडी या संदर्भ संख्या मिलने की व्यवस्था भी रहेगी, जिसे बाद में फील्ड में आने वाले जनगणना कर्मी को दिखाना होगा। स्व-गणना पोर्टल और एसई आईडी जैसी व्यवस्था केंद्र की डिजिटल जनगणना रूपरेखा का हिस्सा है। �

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इसलिए जो लोग खुद से फॉर्म भरना चाहते हैं, उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि मोबाइल नंबर सही हो, परिवार की मूल जानकारी तैयार हो और बाद में मिलने वाली डिजिटल आईडी सुरक्षित रखी जाए। यह छोटा कदम आगे की प्रक्रिया को काफी आसान बना सकता है।

इस बार जनगणना में क्या-क्या पूछा जाएगा?

इस बार की जनगणना को पहले की तुलना में ज्यादा व्यवस्थित और तकनीक-सक्षम बताया जा रहा है। शुरुआती चरण में घर, मकान, बुनियादी सुविधाओं और परिवार की स्थिति से जुड़े सवाल पूछे जाएंगे। केंद्र सरकार ने पहले ही स्पष्ट किया है कि हाउस लिस्टिंग और हाउसिंग ऑपरेशन चरण में 33 सवाल शामिल किए गए हैं। इनमें घर की संरचना, सुविधाएं, ईंधन, पानी, शौचालय, संपत्ति और परिवार से जुड़ी बुनियादी जानकारी शामिल रहती है। �

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सरकार का दावा है कि इस बार डिजिटल प्रक्रिया के जरिए आंकड़ों की गुणवत्ता बेहतर होगी। इससे भविष्य में योजनाएं बनाने, संसाधनों के बंटवारे, ग्रामीण-शहरी जरूरतों की पहचान और विकास कार्यों की प्राथमिकता तय करने में मदद मिलेगी। यानी जनगणना का असर सिर्फ रिकॉर्ड तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी नीति निर्माण में भी इसकी अहम भूमिका होगी।

प्रशासन क्यों मान रहा इसे बेहद अहम?

जनगणना किसी भी सरकार के लिए सिर्फ आबादी गिनने का काम नहीं होती। इसके जरिए राज्य को यह समझने में मदद मिलती है कि किस इलाके में कितने लोग हैं, कितने घर हैं, किन सुविधाओं की कमी है, किस क्षेत्र में किस तरह की योजनाओं की जरूरत ज्यादा है और कहां संसाधनों का दबाव बढ़ रहा है। यही डेटा आगे चलकर सड़क, बिजली, पानी, राशन, स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याणकारी योजनाओं की बुनियाद बनता है।

इसीलिए प्रशासन इसे हल्के में लेने के बजाय बेहद गंभीरता से देख रहा है। ट्रांसफर रोकने जैसे फैसले यह दिखाते हैं कि सरकार चाहती है कि यह पूरा अभियान बिना प्रशासनिक व्यवधान के पूरा हो। बिहार जैसे बड़े और घनी आबादी वाले राज्य में यह और भी ज्यादा जरूरी हो जाता है।

कर्मचारियों के लिए भी राहत, लेकिन जिम्मेदारी भी बढ़ी

इस फैसले का एक पहलू यह भी है कि जिन अधिकारियों और कर्मियों की ड्यूटी जनगणना में लगी है, उन्हें फिलहाल ट्रांसफर की अनिश्चितता से राहत मिलेगी। उन्हें यह चिंता नहीं रहेगी कि बीच काम में पोस्टिंग बदल जाएगी या नई जगह भेज दिया जाएगा। इससे वे एक ही क्षेत्र में रहकर ज्यादा व्यवस्थित तरीके से काम कर सकेंगे।

लेकिन इसके साथ उनकी जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। क्योंकि जब सरकार ने उन्हें स्थिरता दी है, तो अब फील्ड में सही, समयबद्ध और त्रुटिहीन काम की अपेक्षा भी उतनी ही अधिक रहेगी। यानी यह राहत के साथ जवाबदेही बढ़ाने वाला फैसला भी है।

निष्कर्ष

बिहार में जनगणना कार्य को लेकर सरकार अब पूरी गंभीरता के साथ आगे बढ़ रही है। जनगणना ड्यूटी में लगे कर्मियों और अधिकारियों के तबादले पर मार्च 2027 तक रोक लगाकर यह साफ संदेश दिया गया है कि इस राष्ट्रीय अभियान में किसी भी तरह की प्रशासनिक ढिलाई नहीं बरती जाएगी। आने वाले दिनों में स्वगणना, घर-घर सत्यापन और डिजिटल डेटा संग्रह की प्रक्रिया राज्य में व्यापक रूप से देखने को मिलेगी।

आम लोगों के लिए यह जरूरी होगा कि वे समय पर अपनी सही जानकारी उपलब्ध कराएं, ताकि भविष्य की योजनाओं और विकास की दिशा तय करने में बिहार का डेटा मजबूत और भरोसेमंद बन सके।

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