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14 साल से सिस्टम से जूझ रहे पटना के प्रोफेसर, खुद को ‘जिंदा’ साबित करने की लड़ाई

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पटना के प्रोफेसर संजीवधारी सिन्हा पिछले 14 वर्षों से प्रशासनिक उलझनों में फंसे हैं। दस्तावेज होने के बावजूद उन्हें न पूरा वेतन मिला और न ही उनकी पहचान को पूरी तरह स्वीकार किया गया।

पटना/आलम की खबर:पटना के रहने वाले प्रोफेसर संजीवधारी सिन्हा की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति के संघर्ष की नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की जटिलताओं और खामियों को भी उजागर करती है। पिछले लगभग 14 वर्षों से वे एक ऐसी कानूनी और प्रशासनिक लड़ाई लड़ रहे हैं, जिसमें उनके पास अपनी पहचान और सेवा से जुड़े तमाम प्रमाण होने के बावजूद उन्हें लगातार असमंजस की स्थिति में रखा गया है।

प्रोफेसर सिन्हा इस समय विदेश में हैं, लेकिन उनका दावा है कि वे लगातार अपने पेशे से जुड़े रहे हैं और विभिन्न शैक्षणिक व शोध गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी निभाते रहे हैं। उनके पास पासपोर्ट, बैंक स्टेटमेंट, दूतावास के आधिकारिक पत्र, एनओसी और कई सरकारी दस्तावेज मौजूद हैं, जो यह साबित करते हैं कि वे न केवल जीवित हैं, बल्कि अपनी सेवा में भी सक्रिय रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें कई बार प्रशासनिक स्तर पर ‘लापता’ या ‘अवैध’ करार देने की कोशिश की गई।

उनका कहना है कि वर्ष 2014 से 2021 के बीच विभिन्न सरकारी आदेशों और समितियों की रिपोर्टों में उनकी सेवा को मान्यता दी गई है। इसके बावजूद उन्हें उनके पूरे बकाया वेतन का भुगतान नहीं किया गया। जानकारी के अनुसार, 39 महीनों के वेतन में से केवल 21 महीनों का ही भुगतान किया गया, जबकि बाकी राशि अब भी लंबित है। यह स्थिति उनके लिए आर्थिक और मानसिक दोनों स्तरों पर चुनौती बन गई है।

प्रोफेसर सिन्हा का आरोप है कि उनकी फाइलें वर्षों से एक विभाग से दूसरे विभाग तक घूमती रही हैं, लेकिन किसी भी स्तर पर ठोस निर्णय नहीं लिया गया। उन्होंने कई बार संबंधित अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन हर बार उन्हें टालमटोल का सामना करना पड़ा। उनका कहना है कि यह केवल एक व्यक्तिगत मामला नहीं, बल्कि सिस्टम की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है।

स्थिति तब और गंभीर हो गई जब उन्होंने यह आरोप लगाया कि उन्हें दबाव में लाने के लिए बुनियादी सुविधाएं जैसे बिजली और पानी तक काटने की धमकियां दी गईं। उनके अनुसार, यह न सिर्फ मानवीय दृष्टिकोण से गलत है, बल्कि श्रम अधिकारों का भी उल्लंघन है। उनका मानना है कि एक सरकारी कर्मचारी के साथ इस तरह का व्यवहार किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।

विदेश में रहने के कारण उनकी आवाज अक्सर प्रभावी तरीके से सामने नहीं आ पाती, लेकिन अब उन्होंने इस मामले को उच्च स्तर पर उठाने का निर्णय लिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय, अटॉर्नी जनरल और न्याय मंत्रालय तक अपनी बात पहुंचाई है। उनका सवाल साफ है कि जब उनके पास सभी आवश्यक दस्तावेज मौजूद हैं और वे लगातार आधिकारिक संपर्क में रहे हैं, तो फिर उन्हें न्याय पाने के लिए इतना लंबा इंतजार क्यों करना पड़ रहा है।

इस पूरे मामले ने न केवल राज्य स्तर पर, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि किसी व्यक्ति के पास अपनी पहचान और सेवा से जुड़े सभी प्रमाण होने के बावजूद उसे मान्यता नहीं मिलती, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीर खामी को दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में समय पर निष्पक्ष जांच और निर्णय बेहद जरूरी है, ताकि आम लोगों का सिस्टम पर भरोसा बना रहे।

प्रोफेसर सिन्हा ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि उनके मामले का जल्द समाधान नहीं हुआ, तो इसका असर देश की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी पड़ सकता है। उनका कहना है कि जब एक शिक्षित और पेशेवर व्यक्ति को इस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, तो यह वैश्विक मंच पर देश की प्रशासनिक क्षमता पर सवाल खड़े करता है।

फिलहाल, उनकी उम्मीदें उन सरकारी दफ्तरों पर टिकी हैं, जहां उनकी फाइलें वर्षों से लंबित पड़ी हैं। वे चाहते हैं कि उनके मामले को एक ‘गुमशुदा फाइल’ की तरह नहीं, बल्कि एक नागरिक के अधिकारों के सवाल के रूप में देखा जाए और जल्द से जल्द उन्हें न्याय मिले।

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