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क्या डिप्टी सीएम से सीधे मुख्यमंत्री बनेंगे सम्राट चौधरी? बिहार की राजनीति में नई चर्चा तेज

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बिहार की राजनीति में नया सियासी समीकरण चर्चा में है। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने की अटकलें तेज हैं, जिससे डिप्टी सीएम से सीएम बनने की पुरानी परंपरा बदलने की बात हो रही है।

पटना/आलम की खबर:बिहार की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है, जहां पुराने राजनीतिक समीकरणों और परंपराओं को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। राज्य के सियासी गलियारों में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि क्या लंबे समय से चली आ रही एक राजनीतिक परंपरा इस बार टूट सकती है। यह चर्चा भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और मौजूदा उप मुख्यमंत्री Samrat Choudhary को लेकर तेज हो गई है, जिनके नाम को लेकर मुख्यमंत्री पद की संभावनाएं राजनीतिक बहस का केंद्र बनी हुई हैं।

बिहार की राजनीति में यह परंपरा रही है कि उप मुख्यमंत्री पद पर बैठे नेता सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक बहुत कम ही पहुंच पाए हैं। इतिहास पर नजर डालें तो अब तक यह पद अधिकतर सत्ता संतुलन और गठबंधन की राजनीति को साधने के लिए इस्तेमाल किया गया है। हालांकि कुछ अपवादों में कर्पूरी ठाकुर का नाम लिया जाता है, जिन्होंने उप मुख्यमंत्री पद से आगे बढ़कर मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाली थी। अब यही सवाल फिर से उठ रहा है कि क्या सम्राट चौधरी उसी इतिहास को दोहरा पाएंगे या नहीं।

राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि सम्राट चौधरी के आवास पर पार्टी के शीर्ष नेताओं की लगातार आवाजाही हो रही है। इसे लेकर कई तरह के राजनीतिक संकेत भी निकाले जा रहे हैं। हालांकि पार्टी की ओर से आधिकारिक रूप से इस पर कोई बयान नहीं दिया गया है, लेकिन अंदरूनी चर्चाओं ने राजनीतिक माहौल को काफी गर्म कर दिया है।

सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर भी बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण कहानी की तरह देखा जाता है। वे पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी के पुत्र हैं और 1990 के दशक से सक्रिय राजनीति में जुड़े हुए हैं। 1999 में उन्हें राबड़ी देवी सरकार में मंत्री पद की जिम्मेदारी भी मिली थी, हालांकि उस समय उम्र संबंधी विवाद के चलते उन्हें पद छोड़ना पड़ा था। इसके बाद भी उन्होंने राजनीति में लगातार अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखी और परबत्‍ता क्षेत्र से विधायक बनकर 2000 और 2010 में विधानसभा पहुंचे।

2014 में एक बार फिर उन्हें मंत्री पद मिला, जिसके बाद उनका राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया। वर्ष 2018 में उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल (Rashtriya Janata Dal) छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) का दामन थामा। इसके बाद पार्टी संगठन में उनकी भूमिका और मजबूत हुई और वे प्रदेश अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद तक पहुंचे।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में डिप्टी सीएम का पद हमेशा से गठबंधन की राजनीति और सामाजिक संतुलन का प्रतीक रहा है। यह पद कई बार भविष्य के मुख्यमंत्री के रूप में किसी नेता को तैयार करने के बजाय, राजनीतिक समीकरण साधने का माध्यम ज्यादा रहा है। इसी वजह से इस पद से सीधे मुख्यमंत्री बनने का रास्ता आसान नहीं माना जाता।

बिहार में अब तक लगभग दस उप मुख्यमंत्री रह चुके हैं, लेकिन उनमें से केवल कर्पूरी ठाकुर ही ऐसे नेता रहे हैं जिन्होंने बाद में मुख्यमंत्री पद हासिल किया। यह आंकड़ा अपने आप में इस राजनीतिक परंपरा की जटिलता को दर्शाता है।

नीतीश कुमार के लंबे शासनकाल में कई उप मुख्यमंत्री बने, जिनमें Sushil Kumar Modi, Tarkishore Prasad, Renu Devi, Vijay Kumar Sinha और Tejashwi Yadav जैसे बड़े नाम शामिल रहे हैं। इनमें से कई नेताओं को लंबे समय तक उप मुख्यमंत्री रहने का अवसर मिला, लेकिन वे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच सके।

इसी पृष्ठभूमि में अब सम्राट चौधरी का नाम चर्चा में है, जिससे राजनीतिक विश्लेषक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या इस बार इतिहास बदलेगा या नहीं। अगर वे मुख्यमंत्री बनते हैं तो यह बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जाएगा, क्योंकि इससे यह परंपरा टूट जाएगी कि उप मुख्यमंत्री पद केवल सहयोगी भूमिका तक सीमित रहता है।

राजनीतिक जानकारों का यह भी मानना है कि वर्तमान समय में भाजपा के भीतर नेतृत्व परिवर्तन और रणनीतिक बदलाव की चर्चाएं चल रही हैं। ऐसे में यदि सम्राट चौधरी को बड़ी जिम्मेदारी मिलती है तो यह न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि होगी, बल्कि बिहार की सत्ता संरचना में भी बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।

हालांकि अभी तक किसी भी स्तर पर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और यह पूरी चर्चा राजनीतिक अटकलों और विश्लेषण पर आधारित है। लेकिन बिहार की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां समीकरण तेजी से बदलते हैं और अचानक बड़े फैसले सामने आ जाते हैं।

अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या सम्राट चौधरी सच में बिहार के अगले मुख्यमंत्री बनकर एक नई राजनीतिक परंपरा की शुरुआत करेंगे या यह चर्चा सिर्फ राजनीतिक अटकलों तक ही सीमित रह जाएगी।

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