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पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका, ट्रांजिट अग्रिम जमानत रद्द, अब असम कोर्ट जाना होगा

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कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने ट्रांजिट अग्रिम जमानत रद्द करते हुए कहा कि उन्हें असम की अदालत में ही राहत मांगनी होगी।

DESK:कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है, जहां शीर्ष अदालत ने उन्हें मिली ट्रांजिट अग्रिम जमानत को रद्द कर दिया है और साफ तौर पर यह संकेत दिया है कि उन्हें अब असम की सक्षम अदालत में जाकर ही कानूनी राहत मांगनी होगी। इस फैसले के साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अधिकार क्षेत्र (जूरिस्डिक्शन) से जुड़े मामलों में किसी भी तरह की ढिलाई स्वीकार नहीं की जाएगी और आरोपी को उसी राज्य की अदालत में जाना होगा, जहां मामला दर्ज किया गया है। इस आदेश ने न केवल इस केस की दिशा बदल दी है, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों के लिए भी एक स्पष्ट कानूनी संदेश दिया है।

दरअसल, पूरा मामला असम में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा हुआ है, जिसमें पवन खेड़ा के खिलाफ आपराधिक धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया था। इस एफआईआर के बाद गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए खेड़ा ने तेलंगाना हाईकोर्ट का रुख किया था, जहां उन्हें अस्थायी राहत के तौर पर एक सप्ताह की ट्रांजिट अग्रिम जमानत दी गई थी। इस राहत का उद्देश्य यह था कि वे संबंधित राज्य की अदालत में जाकर नियमित जमानत के लिए आवेदन कर सकें। लेकिन इस फैसले को असम सरकार ने चुनौती दी और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुना और फिर यह पाया कि तेलंगाना हाईकोर्ट द्वारा दी गई ट्रांजिट अग्रिम जमानत अधिकार क्षेत्र के लिहाज से उचित नहीं लगती। अदालत ने कहा कि जिस राज्य में मामला दर्ज है, उसी राज्य की अदालत को प्राथमिकता मिलनी चाहिए और किसी अन्य राज्य की अदालत द्वारा इस तरह की राहत देना प्रथम दृष्टया उचित नहीं माना जा सकता।

असम सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस मामले में जोरदार तरीके से अपनी दलीलें रखीं। उन्होंने कहा कि जिस घटना के आधार पर एफआईआर दर्ज हुई है, वह असम में हुई है और इसलिए वहां की अदालत ही इस मामले में उचित मंच है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि तेलंगाना हाईकोर्ट द्वारा दी गई राहत अधिकार क्षेत्र से बाहर का कदम है और इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

तुषार मेहता ने इस मामले को ‘फोरम शॉपिंग’ का उदाहरण बताते हुए कहा कि आरोपी अपनी सुविधा के अनुसार अलग-अलग अदालतों में जाकर राहत पाने की कोशिश करता है, जो कि न्याय व्यवस्था के सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि इस तरह के मामलों में सख्त रुख अपनाया जाए, ताकि न्यायिक प्रणाली की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनी रहे। उनके इन तर्कों को अदालत ने गंभीरता से लिया और अंततः हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने का फैसला सुनाया।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल पवन खेड़ा को गिरफ्तारी से कोई विशेष संरक्षण नहीं दिया जा सकता। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि उनके लिए कानूनी रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। यदि वे असम की सक्षम अदालत में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करते हैं, तो वहां इस आदेश का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा और उनकी याचिका पर स्वतंत्र रूप से विचार किया जाएगा। यानी अदालत ने एक तरफ जहां तत्काल राहत को खत्म किया, वहीं दूसरी ओर उन्हें उचित मंच पर जाकर न्याय मांगने का विकल्प भी खुला रखा।

यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां से जुड़े कथित बयान के संदर्भ में दर्ज एफआईआर से जुड़ा बताया जा रहा है, जिसके चलते यह विवाद उत्पन्न हुआ। इसी वजह से असम सरकार इस मामले में सक्रिय रूप से पैरवी कर रही है और कानूनी स्तर पर इसे गंभीरता से लिया जा रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि सुप्रीम कोर्ट अधिकार क्षेत्र के मामलों को लेकर बेहद सख्त रुख अपना रहा है। अदालत का मानना है कि यदि किसी राज्य में अपराध दर्ज हुआ है, तो संबंधित व्यक्ति को उसी राज्य की न्यायिक प्रक्रिया का पालन करना चाहिए और वहां की अदालत में ही अपनी बात रखनी चाहिए। इससे न केवल न्याय प्रक्रिया व्यवस्थित रहती है, बल्कि अनावश्यक कानूनी जटिलताओं से भी बचा जा सकता है।

अब इस फैसले के बाद सभी की नजर पवन खेड़ा के अगले कदम पर टिकी हुई है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वे कब और कैसे असम की अदालत का रुख करते हैं और वहां से उन्हें किस प्रकार की राहत मिलती है। फिलहाल इतना तय है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने इस मामले को एक नई दिशा दे दी है और यह आने वाले समय में अन्य मामलों के लिए भी एक महत्वपूर्ण कानूनी उदाहरण बन सकता है।

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