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पटना NEET छात्रा केस में बड़ा मोड़: चार्जशीट में देरी से हॉस्टल मालिक को जमानत

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पटना में NEET छात्रा की संदिग्ध मौत मामले में हॉस्टल मालिक को 90 दिन के भीतर चार्जशीट दाखिल न होने के कारण जमानत मिल गई। CBI जांच जारी है।

पटना/आलम की खबर:पटना में NEET की तैयारी कर रही जहानाबाद की एक नाबालिग छात्रा की संदिग्ध मौत के मामले में अब एक अहम कानूनी मोड़ सामने आया है, जहां इस केस में गिरफ्तार शंभू गर्ल्स हॉस्टल के मालिक मनीष रंजन को अदालत से जमानत मिल गई है। यह राहत उन्हें किसी ठोस सबूत के आधार पर नहीं बल्कि जांच एजेंसी द्वारा निर्धारित समयसीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं किए जाने के कारण मिली है, जिसने पूरे मामले की दिशा को अचानक बदल दिया है और एक बार फिर जांच की रफ्तार और प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

दरअसल, इस संवेदनशील मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के हाथ में है और पूरी कार्रवाई न्यायालय की निगरानी में चल रही है, लेकिन आरोपी की गिरफ्तारी के बाद 90 दिनों की तय कानूनी अवधि के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं हो सकी, जिसके कारण अदालत को नियमों के तहत आरोपी को “डिफॉल्ट बेल” देने का फैसला करना पड़ा। इससे पहले भी आरोपी की ओर से कई बार जमानत की मांग की गई थी, लेकिन फरवरी और मार्च में हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाएं खारिज कर दी थीं, हालांकि समयसीमा पूरी होने के बाद कानूनी स्थिति बदल गई और आरोपी को राहत मिल गई।

इस पूरे मामले की शुरुआत जनवरी 2026 में हुई थी, जब जहानाबाद की रहने वाली एक नाबालिग छात्रा पटना में रहकर NEET की तैयारी कर रही थी और 6 जनवरी को अचानक उसकी तबीयत बिगड़ने के बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां इलाज के दौरान 11 जनवरी को उसकी मौत हो गई थी। शुरुआत से ही यह मामला संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत के रूप में देखा गया, जिसके बाद पुलिस ने गंभीर धाराओं में केस दर्ज कर जांच शुरू की थी और हॉस्टल प्रबंधन की भूमिका पर भी सवाल उठे थे।

जांच के दौरान आरोप लगे कि हॉस्टल प्रशासन की ओर से लापरवाही बरती गई और घटना के बाद साक्ष्यों को प्रभावित करने की कोशिश भी की गई, जिसके आधार पर पॉक्सो एक्ट सहित हत्या और आत्महत्या के लिए उकसाने जैसी गंभीर धाराएं लगाई गईं और 14 जनवरी 2026 को मनीष रंजन को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, जहां वे लगातार न्यायिक हिरासत में थे। बाद में मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच CBI को सौंप दी गई, जिससे यह केस और भी हाई-प्रोफाइल हो गया, लेकिन चार्जशीट दाखिल करने में हुई देरी अब पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर रही है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी आपराधिक मामले में समयसीमा का पालन बेहद महत्वपूर्ण होता है और यदि जांच एजेंसी इसमें चूक करती है, तो आरोपी को इसका लाभ मिलना तय है, जैसा कि इस मामले में हुआ है। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि जमानत मिलने का मतलब यह नहीं है कि आरोपी को क्लीन चिट मिल गई है, बल्कि यह केवल एक कानूनी राहत है और जांच पूरी होने के बाद यदि पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं, तो आगे की कार्रवाई में सख्त सजा भी हो सकती है।

इस बीच, पीड़ित परिवार और समाज की नजरें अब CBI की आगे की कार्रवाई पर टिकी हुई हैं, क्योंकि यह मामला न केवल एक छात्रा की संदिग्ध मौत से जुड़ा है, बल्कि यह छात्रावासों की सुरक्षा व्यवस्था, निगरानी और जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। अब देखना यह होगा कि जांच एजेंसी कितनी तेजी से चार्जशीट दाखिल करती है और अदालत में इस केस की सुनवाई किस दिशा में आगे बढ़ती है, क्योंकि यही तय करेगा कि इस बहुचर्चित मामले में न्याय किस तरह और कब तक मिल पाता है।

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