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लोकसभा में ललन सिंह का तीखा हमला, महिला आरक्षण पर विपक्ष को घेरा, नीतीश-लालू का किया जिक्र

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लोकसभा में महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयकों पर चर्चा के दौरान ललन सिंह ने सरकार का पक्ष रखते हुए विपक्ष पर हमला बोला और बिहार मॉडल का उदाहरण दिया।

लोकसभा में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयकों पर चल रही चर्चा के दौरान जनता दल यूनाइटेड के वरिष्ठ नेता Rajiv Ranjan Singh (Lalan Singh) ने सरकार का पक्ष मजबूती से रखते हुए विपक्ष पर तीखा प्रहार किया और अपने पूरे भाषण में राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भों को जोड़ते हुए यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि महिलाओं को सत्ता संरचना में बराबरी की भागीदारी देना अब टालने का विषय नहीं, बल्कि समय की जरूरत बन चुका है।

सदन में बोलते हुए उन्होंने अपने तर्कों की शुरुआत बिहार के अनुभव से की और कहा कि जब वर्ष 2005 में Nitish Kumar के नेतृत्व में नई सरकार बनी, तब अगले ही वर्ष पंचायत और शहरी निकायों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया, जिसने जमीनी स्तर पर राजनीति की तस्वीर बदल दी। उन्होंने इस फैसले को केवल एक राजनीतिक कदम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम बताते हुए कहा कि इससे हजारों महिलाएं पहली बार सत्ता के केंद्र में पहुंचीं और निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा बनीं।

अपने संबोधन के दौरान उन्होंने यह भी याद दिलाया कि उस समय इस फैसले का हर तरफ स्वागत नहीं हुआ था और कई राजनीतिक दलों ने इसका विरोध भी किया था। इसी क्रम में उन्होंने Lalu Prasad Yadav का नाम लेते हुए कहा कि उस दौर में लिए गए फैसलों को लेकर असहमति जताई गई थी, लेकिन समय के साथ यह साबित हो गया कि महिलाओं को अवसर देने से लोकतंत्र मजबूत होता है, कमजोर नहीं।

ललन सिंह ने कहा कि आज जब संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस पहल की जा रही है, तब कुछ दल फिर से सवाल उठा रहे हैं, जो यह दर्शाता है कि उनका रुख स्पष्ट नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश की आधी आबादी को कानून बनाने वाली संस्थाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देना लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है और इसमें किसी तरह की देरी नहीं होनी चाहिए।

अपने भाषण में उन्होंने प्रधानमंत्री Narendra Modi के विजन का भी उल्लेख किया और कहा कि “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” की अवधारणा तभी पूरी तरह सफल हो सकती है, जब महिलाओं को बराबरी का अवसर दिया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि महिला आरक्षण से जुड़े कदम अचानक नहीं उठाए गए हैं, बल्कि इसके पीछे वर्षों की सोच और तैयारी रही है, जिसे अब विधायी रूप दिया जा रहा है।

परिसीमन विधेयक पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है और इससे प्रतिनिधित्व अधिक संतुलित और न्यायसंगत बनता है। उनका तर्क था कि यदि सीटों की संख्या में बढ़ोतरी होती है, तो महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करना और अधिक प्रभावी तरीके से संभव होगा। उन्होंने इस प्रक्रिया को लेकर उठ रही आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा कि यह पूरी तरह संवैधानिक और पारदर्शी तरीके से किया जाएगा, इसलिए इसे लेकर अनावश्यक भ्रम फैलाना उचित नहीं है।

अपने संबोधन के दौरान उन्होंने विपक्ष, खासकर कांग्रेस पर भी निशाना साधते हुए कहा कि जब इस मुद्दे पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाई गई थी, तब कुछ दल उसमें शामिल नहीं हुए, जो यह दर्शाता है कि वे इस विषय को गंभीरता से लेने के बजाय राजनीतिक नजरिए से देख रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि महिला आरक्षण को जल्दबाजी में लाया गया कदम बताना गलत है, क्योंकि इसकी प्रक्रिया लंबे समय से चल रही है और इसे पूरी तैयारी के साथ सदन में लाया गया है।

अपने भाषण के अंत में ललन सिंह ने विश्वास जताया कि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलने से न केवल लोकतंत्र मजबूत होगा, बल्कि नीति निर्माण की प्रक्रिया भी अधिक समावेशी और संवेदनशील बनेगी। उन्होंने कहा कि देश की महिलाएं इस पहल का स्वागत करेंगी और आने वाले समय में इसका सकारात्मक प्रभाव हर स्तर पर देखने को मिलेगा, वहीं इसका विरोध करने वाले राजनीतिक रूप से नुकसान भी उठा सकते हैं।

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