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मुजफ्फरपुर में अंतरराष्ट्रीय डेटा तस्करी गिरोह का भंडाफोड़, चार गिरफ्तार, विदेशी कनेक्शन उजागर

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मुजफ्फरपुर में पुलिस और बिहार STF ने अंतरराष्ट्रीय साइबर डेटा तस्करी गिरोह का पर्दाफाश किया है। चार आरोपी गिरफ्तार, विदेशी अपराधियों से कनेक्शन सामने आया।

मुजफ्फरपुर/आलम की खबर:बिहार के मुजफ्फरपुर जिले से एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाला साइबर अपराध का मामला सामने आया है, जहां स्थानीय पुलिस और बिहार एसटीएफ की संयुक्त कार्रवाई में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय एक हाई-टेक डेटा तस्करी गिरोह का खुलासा हुआ है। इस ऑपरेशन के दौरान चार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जो कथित तौर पर भारतीय नागरिकों की निजी और संवेदनशील जानकारी चोरी कर विदेशों में बैठे साइबर अपराधियों को बेच रहे थे।

इस पूरे मामले की शुरुआत 21 अप्रैल 2026 को मिली एक गोपनीय सूचना से हुई, जिसमें संकेत मिला था कि मुजफ्फरपुर के अहियापुर थाना क्षेत्र से एक संगठित साइबर नेटवर्क संचालित किया जा रहा है। सूचना मिलते ही पुलिस ने मामले की गंभीरता को समझते हुए तत्काल विशेष जांच टीम का गठन किया, जिसमें साइबर थाना, जिला आसूचना इकाई (DIU) और बिहार एसटीएफ के अधिकारी शामिल किए गए।

जांच की कमान सिटी एसपी मोहिबुल्लाह अंसारी और साइबर डीएसपी हिमांशु कुमार को सौंपी गई। तकनीकी निगरानी और गुप्त सूचना के आधार पर पुलिस टीम ने मुख्य आरोपी रिषभ कुमार के ठिकाने पर छापेमारी की और उसे हिरासत में ले लिया। पूछताछ के दौरान मिले सुरागों के आधार पर पुलिस ने उसके तीन अन्य सहयोगियों को भी अलग-अलग स्थानों से गिरफ्तार कर लिया।

गिरफ्तार आरोपियों में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से दीपक चौधरी उर्फ आशु कुमार, दरभंगा निवासी सुधांशु कुमार और मुजफ्फरपुर के ही साहिल कुमार शामिल हैं। पुलिस ने इस गिरोह से जुड़े अन्य संदिग्ध सदस्यों की भी पहचान कर ली है और उनकी गिरफ्तारी के लिए लगातार छापेमारी की जा रही है।

जांच के दौरान यह बात सामने आई कि यह गिरोह अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर डेटा चोरी की घटनाओं को अंजाम देता था। आरोपी ओपन सोर्स इंटेलिजेंस तकनीक, फर्जी सिम कार्ड और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म का उपयोग कर लोगों की निजी जानकारी इकट्ठा करते थे। इसके अलावा, वे फर्जी एपीआई तैयार कर विभिन्न डेटाबेस में अनधिकृत तरीके से प्रवेश करते थे, जिससे बड़ी मात्रा में डेटा तक पहुंच संभव हो पाती थी।

पुलिस द्वारा जब्त किए गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की प्रारंभिक जांच में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। आरोपियों के पास से मोबाइल फोन, टैबलेट और अन्य डिजिटल डिवाइस बरामद किए गए हैं, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों के मोबाइल नंबर, आधार और पैन से जुड़ी जानकारी, वाहन पंजीकरण विवरण, बैंक खातों से संबंधित डेटा और अन्य संवेदनशील जानकारियां मौजूद थीं।

यह भी सामने आया है कि इस चोरी किए गए डेटा को बांग्लादेश समेत अन्य देशों के साइबर अपराधियों को बेचा जाता था। इसके लिए आरोपी क्रिप्टोकरेंसी और फर्जी बैंक खातों का इस्तेमाल करते थे, ताकि लेन-देन को ट्रैक करना मुश्किल हो सके। जांच एजेंसियों को आरोपियों के मोबाइल फोन से विदेशी नेटवर्क के साथ बातचीत के प्रमाण भी मिले हैं, जिससे इस पूरे गिरोह के अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन की पुष्टि हुई है।

इस मामले में कांतेश कुमार मिश्रा ने बताया कि यह नेटवर्क बेहद संगठित और तकनीकी रूप से सक्षम था। उन्होंने कहा कि गिरोह के सदस्य एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म के जरिए एक-दूसरे से जुड़े रहते थे और अपने ऑपरेशन को इस तरह संचालित करते थे कि सुरक्षा एजेंसियों को भनक तक न लगे।

पुलिस ने आरोपियों के बैंक खातों में जमा लगभग चार लाख रुपये की राशि को फ्रीज कर दिया है। साथ ही जब्त किए गए सभी डिजिटल उपकरणों को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है, ताकि इस नेटवर्क के अन्य सदस्यों और इसके पूरे ऑपरेशन की गहराई तक पहुंचा जा सके।

मामले की गंभीरता को देखते हुए अब केंद्रीय जांच एजेंसियों को भी इस जांच में शामिल करने की तैयारी की जा रही है। अधिकारियों का मानना है कि यह नेटवर्क देश के कई राज्यों और विदेशों तक फैला हो सकता है, इसलिए इसके हर पहलू की गहन जांच जरूरी है।

इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि डिजिटल युग में साइबर अपराध कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं और किस तरह आम लोगों की निजी जानकारी खतरे में है। पुलिस ने आम नागरिकों से अपील की है कि वे अपनी व्यक्तिगत जानकारी जैसे आधार नंबर, ओटीपी, बैंक डिटेल्स या अन्य संवेदनशील डेटा किसी भी अनजान व्यक्ति के साथ साझा न करें।

विशेषज्ञों का कहना है कि साइबर अपराधी अब पहले से ज्यादा तकनीकी रूप से सक्षम हो गए हैं और नए-नए तरीकों से लोगों को निशाना बना रहे हैं। ऐसे में जागरूकता और सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है।

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