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झाझा में 5.75 करोड़ का नया स्वास्थ्य केंद्र बंद, पुराने अस्पताल में फर्श पर इलाज को मजबूर मरीज

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जमुई के झाझा में करोड़ों की लागत से बना नया स्वास्थ्य केंद्र अब तक चालू नहीं हुआ, जबकि पुराने अस्पताल में बेड की कमी से मरीज फर्श पर इलाज के लिए मजबूर हैं।

जमुई/आलम की खबर:बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर एक बार फिर सामने आया है। जमुई जिले के झाझा प्रखंड से आई तस्वीरें न सिर्फ चिंताजनक हैं, बल्कि पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। यहां एक ओर करोड़ों रुपये की लागत से बना नया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र उद्घाटन के बाद भी बंद पड़ा है, वहीं दूसरी ओर पुराने अस्पताल में मरीजों को बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझना पड़ रहा है।

जानकारी के अनुसार, झाझा में करीब 5.75 करोड़ रुपये की लागत से एक नया स्वास्थ्य केंद्र भवन तैयार किया गया था। इसका उद्घाटन भी हो चुका है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि अब तक इसमें चिकित्सा सेवाएं शुरू नहीं हो सकी हैं। यह भवन फिलहाल उपयोग के बजाय सिर्फ एक संरचना बनकर रह गया है, जिससे आम जनता को कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है।

इसके विपरीत, पुराने अस्पताल भवन में हालात बेहद दयनीय बने हुए हैं। यहां बेड की भारी कमी के कारण मरीजों को फर्श पर लेटकर इलाज का इंतजार करना पड़ रहा है। अस्पताल में मौजूद संसाधन बढ़ती मरीज संख्या के सामने पूरी तरह नाकाफी साबित हो रहे हैं।

मंगलवार को सामने आई एक घटना ने इस पूरी स्थिति को और उजागर कर दिया। चरघरा गांव की रहने वाली एक महिला अपने बीमार पति को लेकर अस्पताल पहुंचीं, लेकिन वहां उन्हें बेड उपलब्ध नहीं हो सका। मजबूरी में उन्हें अपने पति को फर्श पर ही लिटाना पड़ा और लंबे समय तक इंतजार करना पड़ा। गर्मी और भीड़ के बीच यह स्थिति किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देने वाली थी।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, महिला अपने पति को संभालते हुए घंटों फर्श पर बैठी रहीं। आसपास मौजूद अन्य मरीज और उनके परिजन भी इसी तरह की समस्याओं से जूझते नजर आए। अस्पताल में बेड की कमी के कारण कई मरीजों को अस्थायी व्यवस्था के तहत फर्श या बरामदे में रखा जा रहा है।

जब इस मामले पर अस्पताल प्रशासन से सवाल किया गया, तो प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. नवाब ने कहा कि नए भवन में सेवाएं शुरू होने के बाद इस तरह की समस्याएं स्वतः समाप्त हो जाएंगी। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि नया अस्पताल आखिर कब तक पूरी तरह चालू होगा।

स्थानीय लोगों का कहना है कि नया स्वास्थ्य केंद्र बनने से उन्हें काफी उम्मीदें थीं, लेकिन अब तक उसका संचालन शुरू नहीं होने से निराशा बढ़ती जा रही है। लोगों का आरोप है कि उद्घाटन के बाद भी भवन को चालू करने में अनावश्यक देरी की जा रही है, जिससे मरीजों को परेशानी झेलनी पड़ रही है।

यह मामला न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की कमी को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि योजनाओं के क्रियान्वयन में किस तरह की लापरवाही बरती जा रही है। करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद यदि आम जनता को उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में केवल भवन निर्माण पर्याप्त नहीं है, बल्कि वहां आवश्यक स्टाफ, उपकरण और सेवाओं की उपलब्धता भी उतनी ही जरूरी है। यदि इन सभी पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया जाता, तो ऐसी परियोजनाएं केवल कागजों तक सीमित रह जाती हैं।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब स्थानीय लोग और जनप्रतिनिधि सरकार से जवाब मांग रहे हैं कि आखिर नया अस्पताल कब तक चालू होगा और मरीजों को बेहतर सुविधा कब मिलेगी। लोगों की मांग है कि जल्द से जल्द नए भवन में सेवाएं शुरू की जाएं, ताकि मरीजों को राहत मिल सके और उन्हें इस तरह की कठिन परिस्थितियों का सामना न करना पड़े।

फिलहाल, झाझा का यह मामला बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी सच्चाई को सामने लाता है, जहां एक ओर संसाधनों का निर्माण हो रहा है, वहीं दूसरी ओर उनके उपयोग में देरी से आम जनता परेशान हो रही है।

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