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बिहार में नई सरकार की अग्निपरीक्षा, विधानसभा में बहुमत साबित करने उतरे सम्राट चौधरी

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बिहार विधानसभा में सम्राट चौधरी सरकार ने बहुमत का दावा पेश किया। NDA के पास स्पष्ट बहुमत है और आज विश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के बाद मतदान होगा।

पटना/आलम की खबर:बिहार की राजनीति इस समय अपने अहम दौर से गुजर रही है, जहां नई सरकार के गठन के बाद अब उसकी असली परीक्षा विधानसभा के भीतर शुरू हो चुकी है। मुख्यमंत्री Samrat Choudhary ने बिहार विधानसभा में बहुमत का दावा पेश कर दिया है और इसी के साथ राज्य की राजनीतिक हलचल अपने चरम पर पहुंच गई है। विश्वास प्रस्ताव को लेकर बुलाए गए इस विशेष सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों पूरी तैयारी के साथ नजर आ रहे हैं, जिससे सदन का माहौल बेहद गर्म और प्रतिस्पर्धी हो गया है।

विधानसभा अध्यक्ष Prem Kumar ने इस महत्वपूर्ण बहस के लिए सभी दलों को पर्याप्त समय देने का फैसला किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रत्येक प्रमुख दल के नेताओं को अपने विचार रखने के लिए लगभग 90 मिनट का समय दिया जाएगा, ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत हर पक्ष अपनी बात विस्तार से रख सके। इस निर्णय के बाद यह साफ हो गया कि बहस लंबी और गहन होने वाली है।

विश्वास प्रस्ताव पर चर्चा की शुरुआत नेता प्रतिपक्ष Tejashwi Yadav ने की, जिनके भाषण के दौरान सदन का माहौल अचानक गरमा गया। उन्होंने सरकार पर कई राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल उठाए, जिससे सत्ता पक्ष के विधायकों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी और सदन में तीखी नोकझोंक देखने को मिली। इस दौरान कई बार हंगामे की स्थिति भी बनी, जिसे नियंत्रित करने के लिए स्पीकर को हस्तक्षेप करना पड़ा।

243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में वर्तमान में एक सीट खाली है, जिसके कारण प्रभावी सदस्य संख्या 242 मानी जा रही है। ऐसे में बहुमत का आंकड़ा 122 के आसपास ठहरता है। इस लिहाज से देखा जाए तो मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार मजबूत स्थिति में नजर आती है।

सत्ता पक्ष के आंकड़ों पर नजर डालें तो एनडीए के पास कुल 202 विधायक हैं, जो बहुमत के आंकड़े से काफी अधिक है। इनमें भाजपा के 89 विधायक, जदयू के 85 विधायक, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के 19 विधायक, हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के 5 और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के 4 विधायक शामिल हैं। इन आंकड़ों के आधार पर यह स्पष्ट है कि सरकार के लिए बहुमत साबित करना औपचारिकता मात्र रह गया है।

वहीं विपक्ष की बात करें तो महागठबंधन के पास कुल 35 विधायक हैं। इनमें राष्ट्रीय जनता दल के 25, कांग्रेस के 6, सीपीआई-एमएल के 2, सीपीआई-एम के 1 और एक अन्य विधायक शामिल हैं। संख्या बल के लिहाज से विपक्ष कमजोर स्थिति में जरूर दिखता है, लेकिन बहस के दौरान वह सरकार को घेरने की पूरी कोशिश कर रहा है।

नई सरकार के गठन के बाद यह पहला बड़ा अवसर है जब उसे सदन के भीतर अपनी ताकत साबित करनी है। सम्राट चौधरी ने दो उपमुख्यमंत्रियों—विजय कुमार चौधरी और बिजेन्द्र प्रसाद यादव—के साथ शपथ ली थी और अब उनकी सरकार को विश्वास मत के जरिए अपनी वैधता को मजबूत करना है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही संख्या बल सरकार के पक्ष में है, लेकिन यह बहस केवल आंकड़ों की नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश देने का भी मंच है। विपक्ष इस मौके का इस्तेमाल सरकार की नीतियों और फैसलों पर सवाल उठाने के लिए कर रहा है, जबकि सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियों और योजनाओं को सामने रखकर जनता का भरोसा मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

सदन में जारी बहस के दौरान कई बार राजनीतिक कटाक्ष और तीखे बयान भी देखने को मिल रहे हैं। दोनों पक्षों के बीच जारी इस जुबानी जंग ने विधानसभा के माहौल को और भी अधिक गर्म कर दिया है।

निष्कर्ष:

बिहार विधानसभा में चल रहा यह विश्वास प्रस्ताव केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं बल्कि राज्य की राजनीति का अहम पड़ाव है। जहां एक ओर एनडीए सरकार बहुमत के आंकड़े के साथ मजबूत स्थिति में है, वहीं विपक्ष इस मौके को सरकार पर दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। अब सबकी नजरें मतदान पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि नई सरकार कितनी मजबूती के साथ आगे बढ़ेगी।

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