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पटना हाईकोर्ट का विशिष्ट शिक्षकों के पक्ष में बड़ा फैसला, मनचाहे जिले में पोस्टिंग का अधिकार बरकरार

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पटना हाईकोर्ट ने बिहार के विशिष्ट शिक्षकों को बड़ी राहत देते हुए मनचाहे जिले में पदस्थापन के अधिकार को बरकरार रखा है। कोर्ट ने सरकार के उस संशोधित आदेश को रद्द कर दिया, जिससे पहले से पूरी हो चुकी चयन प्रक्रिया प्रभावित हो रही थी।

पटना/आलम की खबर:पटना हाईकोर्ट ने बिहार के विशिष्ट शिक्षकों को बड़ी राहत देते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा है कि चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद सरकार नियमों में बदलाव कर शिक्षकों के अधिकारों को प्रभावित नहीं कर सकती। कोर्ट ने राज्य सरकार के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत विशिष्ट शिक्षकों को अपने पसंदीदा जिले में पदस्थापन का अधिकार समाप्त कर दिया गया था। इस फैसले के बाद हजारों शिक्षकों को राहत मिली है, जो पिछले कई महीनों से अनिश्चितता और प्रशासनिक उलझनों का सामना कर रहे थे।

यह फैसला न्यायमूर्ति आलोक कुमार सिन्हा की एकलपीठ ने सुनाया। मामले की सुनवाई 350 से अधिक विशिष्ट शिक्षकों द्वारा दायर याचिकाओं पर की गई। इन शिक्षकों ने राज्य सरकार और शिक्षा विभाग के उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसके कारण उनकी नियुक्ति और पदस्थापन प्रक्रिया प्रभावित हो गई थी। शिक्षकों का कहना था कि सरकार ने चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद नियम बदलकर उनके साथ अन्याय किया है।

दरअसल बिहार सरकार ने वर्ष 2023 में “विशिष्ट शिक्षक नियुक्ति एवं सेवा शर्त नियमावली” लागू की थी। इस नई व्यवस्था के तहत पहले से कार्यरत नियोजित शिक्षकों को दक्षता परीक्षा के माध्यम से विशिष्ट शिक्षक बनने का अवसर दिया गया था। सरकार की इस पहल को शिक्षा व्यवस्था में सुधार और योग्य शिक्षकों को बेहतर अवसर देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया था।

नियमावली के अनुसार शिक्षकों को आवेदन के दौरान अपनी पसंद के तीन जिलों का विकल्प चुनने की सुविधा दी गई थी। इसी आधार पर हजारों शिक्षकों ने परीक्षा में हिस्सा लिया और चयन प्रक्रिया पूरी की। कई शिक्षकों को औपबंधिक नियुक्ति पत्र भी जारी कर दिए गए थे। इसके बाद केवल अंतिम पदस्थापन और स्कूल आवंटन की प्रक्रिया बची हुई थी। शिक्षकों को उम्मीद थी कि जल्द ही उन्हें उनके चुने हुए जिलों में नई जिम्मेदारी मिल जाएगी।

लेकिन इसी बीच राज्य सरकार ने दिसंबर 2024 में नियमों में संशोधन कर दिया। सरकार की ओर से जारी नए आदेश में शिक्षकों को जिले चुनने का अधिकार समाप्त कर दिया गया। इसके कुछ ही दिनों बाद प्राथमिक शिक्षा निदेशालय की ओर से एक और आदेश जारी हुआ, जिसमें कई शिक्षकों की औपबंधिक नियुक्ति को रद्द करने और उन्हें पुराने कार्यस्थल पर वापस भेजने का निर्देश दिया गया। इस फैसले ने शिक्षकों के बीच भारी असंतोष पैदा कर दिया।

प्रभावित शिक्षकों का कहना था कि उन्होंने सरकार द्वारा तय नियमों के आधार पर परीक्षा दी, चयन प्रक्रिया में हिस्सा लिया और उसी नियम के अनुसार जिले का विकल्प चुना था। ऐसे में पूरी प्रक्रिया समाप्त होने के बाद नियम बदलना उनके अधिकारों का उल्लंघन है। शिक्षकों ने इसे न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कई अहम टिप्पणियां कीं। अदालत ने कहा कि जब चयन प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी थी और केवल पदस्थापन शेष था, तब तक चयनित शिक्षकों को वैध अधिकार प्राप्त हो चुका था। ऐसे में बाद में नियमों में बदलाव कर उनके अधिकार समाप्त नहीं किए जा सकते। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रशासनिक फैसले पारदर्शी, स्थिर और पूर्व निर्धारित नियमों के अनुरूप होने चाहिए।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी भी भर्ती या चयन प्रक्रिया के दौरान नियम बदलना चयनित उम्मीदवारों के हितों को प्रभावित करता है और इससे प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते हैं। अदालत ने कहा कि यदि सरकार चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद नियमों में संशोधन कर पहले से मिले अधिकार वापस लेने लगेगी, तो इससे अभ्यर्थियों का भरोसा कमजोर होगा।

कोर्ट की इस टिप्पणी को प्रशासनिक कानून और सेवा नियमों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला भविष्य में होने वाली भर्ती प्रक्रियाओं के लिए भी एक मिसाल बनेगा। इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि सरकारें चयन प्रक्रिया शुरू होने के बाद मनमाने तरीके से नियम नहीं बदल सकतीं।

इस फैसले के बाद बिहार के हजारों विशिष्ट शिक्षकों में खुशी का माहौल है। शिक्षकों का कहना है कि लंबे समय से वे मानसिक तनाव में थे क्योंकि उनकी नियुक्ति और पदस्थापन दोनों अधर में लटक गए थे। कई शिक्षकों ने अपने परिवार, बच्चों की पढ़ाई और भविष्य की योजना चुने गए जिलों के अनुसार तय कर ली थी। ऐसे में सरकार के अचानक फैसले ने उन्हें मुश्किल में डाल दिया था।

शिक्षक संगठनों ने भी हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। विभिन्न संगठनों का कहना है कि अदालत ने शिक्षकों के अधिकारों की रक्षा की है और यह फैसला शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा। कई शिक्षक नेताओं ने कहा कि यदि कोर्ट से राहत नहीं मिलती तो हजारों शिक्षकों का भविष्य प्रभावित हो सकता था।

अब इस फैसले के बाद शिक्षा विभाग के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है। विभाग को फिर से पदस्थापन प्रक्रिया पूरी करनी होगी और चयनित शिक्षकों को उनके विकल्प के अनुसार जिले आवंटित करने पड़ सकते हैं। माना जा रहा है कि विभाग इस फैसले का कानूनी अध्ययन कर आगे की रणनीति तय करेगा। हालांकि फिलहाल कोर्ट के आदेश के बाद शिक्षकों को बड़ी राहत मिल गई है।

राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भी इस फैसले की चर्चा हो रही है। विपक्षी दल सरकार पर लगातार शिक्षा व्यवस्था में अव्यवस्था फैलाने का आरोप लगाते रहे हैं। अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल उठने लगे हैं। हालांकि सरकार की ओर से अभी इस फैसले पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

कुल मिलाकर पटना हाईकोर्ट का यह फैसला बिहार के विशिष्ट शिक्षकों के लिए बड़ी कानूनी जीत के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने साफ संदेश दिया है कि चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद नियम बदलकर चयनित अभ्यर्थियों के अधिकार छीने नहीं जा सकते। इस फैसले से न केवल शिक्षकों को राहत मिली है, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और स्थिरता की आवश्यकता भी एक बार फिर सामने आई है।

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