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बिहार में ‘ऑपरेशन लंगड़ा’ से अपराधियों में दहशत! एनकाउंटर पर जातीय राजनीति तेज, सरकार और विपक्ष आमने-सामने

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बिहार में अपराधियों के खिलाफ चल रहे ‘ऑपरेशन लंगड़ा’ को लेकर राजनीति गरमा गई है। विपक्ष ने जातीय आधार पर कार्रवाई का आरोप लगाया, जबकि सरकार और पुलिस ने इसे अपराध के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति बताया।

पटना/आलम की खबर: बिहार में नई सरकार बनने के बाद कानून-व्यवस्था को लेकर सख्ती लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में राज्य सरकार अपराधियों के खिलाफ आक्रामक रणनीति पर काम करती नजर आ रही है। पिछले कुछ हफ्तों में बिहार पुलिस और एसटीएफ द्वारा कई बड़े अपराधियों के खिलाफ की गई कार्रवाई ने राज्य की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ सरकार इसे अपराध नियंत्रण की दिशा में निर्णायक कदम बता रही है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इन कार्रवाइयों पर सवाल खड़े कर रहा है।

बिहार में इन दिनों जिस शब्द की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह है “ऑपरेशन लंगड़ा”। पुलिस महकमे में यह शब्द उन कार्रवाइयों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, जिनमें मुठभेड़ के दौरान अपराधियों के पैर में गोली मारकर उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है। सरकार का दावा है कि इससे अपराधियों के मन में पुलिस का डर पैदा हुआ है और संगठित अपराध पर लगाम लग रही है।

राज्य में 15 अप्रैल 2026 को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद सम्राट चौधरी ने सार्वजनिक मंचों से अपराध के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति अपनाने की बात कही थी। इसके बाद से पुलिस और एसटीएफ लगातार एक्शन मोड में नजर आ रही है। हाल के दिनों में समस्तीपुर, पूर्णिया, भागलपुर, मोतिहारी, सीवान और पटना समेत कई जिलों में हुई मुठभेड़ों ने राज्यभर का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

ताजा मामला समस्तीपुर जिले के उजियारपुर थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां पुलिस और एसटीएफ की संयुक्त टीम ने कुख्यात अपराधी प्रिंस कुमार को मुठभेड़ के दौरान पकड़ लिया। पुलिस के अनुसार, प्रिंस कई लूट और फायरिंग की घटनाओं में वांछित था। जब पुलिस ने उसे घेरने की कोशिश की तो उसने फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में उसके पैर में गोली लगी और उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

पुलिस का कहना है कि हाल के दिनों में राज्यभर में अपराधियों के खिलाफ चलाए गए अभियान का असर अब जमीन पर दिखाई देने लगा है। कई अपराधी या तो फरार हैं या फिर आत्मसमर्पण की तैयारी में हैं। पुलिस मुख्यालय का दावा है कि संगठित गिरोहों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है और किसी भी अपराधी को बख्शा नहीं जाएगा।

हालांकि इन कार्रवाइयों ने अब राजनीतिक रंग भी लेना शुरू कर दिया है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि बिहार में एनकाउंटर की कार्रवाई जातीय आधार पर की जा रही है। उन्होंने कहा कि कुछ खास समुदायों को निशाना बनाया जा रहा है। विपक्ष के इस आरोप के बाद राजनीतिक माहौल और गरमा गया है।

विपक्ष के आरोपों के जवाब में पुलिस मुख्यालय और सत्ताधारी दल ने साफ कहा है कि कार्रवाई केवल अपराध और पुलिस पर हमले के आधार पर की जा रही है, किसी जाति या समुदाय को देखकर नहीं। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जिन अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई हुई है, वे अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं और सभी पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे।

हाल के एनकाउंटर मामलों पर नजर डालें तो पुलिस की कार्रवाई में विभिन्न जातियों और समुदायों से जुड़े अपराधी शामिल रहे हैं। कुछ मामलों में यादव, भूमिहार, मुस्लिम, ब्राह्मण, वैश्य और अन्य पिछड़े वर्गों से जुड़े अपराधियों पर कार्रवाई हुई है। इसी आधार पर सरकार विपक्ष के जातीय आरोपों को राजनीति से प्रेरित बता रही है।

भागलपुर और खगड़िया के दियारा इलाकों में सक्रिय कुख्यात अपराधी रामधनी यादव पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। उस पर रंगदारी, हत्या और कई संगीन मामले दर्ज थे। वहीं पूर्णिया में बाइक लिफ्टर और हथियार तस्करी से जुड़े दो अपराधियों को पुलिस ने घायल अवस्था में गिरफ्तार किया। मोतिहारी में रंगदारी और कॉन्ट्रैक्ट किलिंग से जुड़े अपराधियों के खिलाफ भी एसटीएफ ने बड़ी कार्रवाई की थी।

पटना के गौरीचक डबल मर्डर केस में वांछित अपराधियों को भी पुलिस ने मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया। इन मामलों को लेकर सरकार का कहना है कि अपराधी चाहे किसी भी जाति या समुदाय से हो, कानून से ऊपर कोई नहीं है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बिहार में कानून-व्यवस्था हमेशा चुनावी मुद्दा रही है। ऐसे में सरकार अपराध पर सख्ती दिखाकर जनता के बीच मजबूत संदेश देने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर विपक्ष इन कार्रवाइयों के जरिए सरकार को घेरने का अवसर तलाश रहा है। यही वजह है कि एनकाउंटर की घटनाएं अब केवल पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का हिस्सा भी बनती जा रही हैं।

कानून विशेषज्ञों का कहना है कि अपराध नियंत्रण जरूरी है, लेकिन हर कार्रवाई संवैधानिक दायरे में होनी चाहिए। पुलिस को आत्मरक्षा का अधिकार जरूर है, लेकिन हर मुठभेड़ की निष्पक्ष जांच भी उतनी ही जरूरी होती है। इससे पुलिस कार्रवाई की पारदर्शिता बनी रहती है और किसी तरह के विवाद की गुंजाइश कम होती है।

ग्रामीण और शहरी इलाकों में आम लोगों के बीच पुलिस की इस सख्ती को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कई लोग मानते हैं कि अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई जरूरी है क्योंकि लंबे समय से राज्य में अपराध की घटनाओं ने लोगों की चिंता बढ़ाई थी। वहीं कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि पुलिस कार्रवाई पूरी तरह निष्पक्ष और कानूनी प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए।

बिहार सरकार फिलहाल अपराध के खिलाफ अपने अभियान को जारी रखने के मूड में दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी कई मंचों से साफ कह चुके हैं कि राज्य में कानून का राज कायम करना उनकी प्राथमिकता है। दूसरी ओर विपक्ष लगातार सरकार की रणनीति पर सवाल उठा रहा है।

अब आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बिहार में अपराध के खिलाफ यह आक्रामक अभियान किस दिशा में आगे बढ़ता है और इसका राजनीतिक असर राज्य की सियासत पर कितना गहरा पड़ता है।

संपादकीय: अपराध पर सख्ती जरूरी, लेकिन कानून और निष्पक्षता भी उतनी ही अहम

बिहार में पिछले कुछ समय से अपराधियों के खिलाफ जिस तरह पुलिस और एसटीएफ लगातार कार्रवाई कर रही है, उसने एक बार फिर कानून-व्यवस्था को राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में ला दिया है। सरकार इसे अपराध के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” नीति बता रही है, जबकि विपक्ष इन कार्रवाइयों पर सवाल उठा रहा है। ऐसे माहौल में सबसे जरूरी बात यह है कि अपराध और राजनीति के बीच संतुलन बनाए रखा जाए, क्योंकि कानून का उद्देश्य केवल डर पैदा करना नहीं, बल्कि न्याय सुनिश्चित करना भी होता है।

यह सच है कि बिहार लंबे समय तक अपराध, रंगदारी, लूट और गैंगवार जैसी घटनाओं से जूझता रहा है। आम लोगों के मन में सुरक्षा को लेकर चिंता बनी रहती थी। ऐसे में यदि सरकार अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करती है तो आम जनता स्वाभाविक रूप से उसका समर्थन करती है। कोई भी समाज तब तक सुरक्षित महसूस नहीं कर सकता, जब तक अपराधियों के मन में कानून का डर न हो। इसलिए अपराध नियंत्रण के लिए पुलिस की सक्रियता जरूरी है।

लेकिन दूसरी ओर यह भी उतना ही जरूरी है कि हर कार्रवाई संविधान और कानून की सीमाओं के भीतर हो। लोकतंत्र में पुलिस को अधिकार जरूर दिए गए हैं, लेकिन उन अधिकारों के साथ जवाबदेही भी जुड़ी होती है। किसी भी मुठभेड़ या एनकाउंटर को केवल “कड़ी कार्रवाई” कहकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। हर घटना की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि यह भरोसा बना रहे कि कानून का इस्तेमाल न्याय के लिए हो रहा है, किसी दबाव या पूर्वाग्रह के लिए नहीं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब अपराध के मुद्दे को भी जातीय चश्मे से देखा जाने लगा है। बिहार की राजनीति लंबे समय से जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन अपराध और कानून-व्यवस्था जैसे गंभीर विषय को जातीय बहस में बदल देना समाज के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता। अपराधी की पहचान उसका अपराध होना चाहिए, उसकी जाति या समुदाय नहीं। यदि पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठते हैं तो उसका जवाब तथ्यों और पारदर्शिता से दिया जाना चाहिए, न कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से।

सरकार को यह समझना होगा कि केवल एनकाउंटर या सख्त बयानबाजी से अपराध पूरी तरह खत्म नहीं होते। अपराध के पीछे बेरोजगारी, कमजोर सामाजिक व्यवस्था, राजनीतिक संरक्षण और धीमी न्यायिक प्रक्रिया जैसी कई गहरी वजहें भी होती हैं। इसलिए स्थायी समाधान के लिए पुलिस कार्रवाई के साथ-साथ न्याय व्यवस्था को मजबूत करना, युवाओं को रोजगार देना और समाज में कानून के प्रति भरोसा पैदा करना भी जरूरी है।

वहीं विपक्ष की भी जिम्मेदारी है कि वह केवल राजनीतिक लाभ के लिए हर कार्रवाई को विवाद का विषय न बनाए। यदि कहीं गलत कार्रवाई हुई है तो उसके खिलाफ तथ्यों के आधार पर आवाज उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन हर पुलिस कार्रवाई को सीधे जातीय रंग देना समाज में अविश्वास बढ़ा सकता है।

बिहार इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां जनता सुरक्षा भी चाहती है और न्याय भी। सरकार की सख्ती तब ही सफल मानी जाएगी जब अपराधियों में डर के साथ आम नागरिकों के मन में कानून के प्रति भरोसा भी मजबूत हो। कानून का राज केवल गोली से नहीं, बल्कि निष्पक्ष और पारदर्शी व्यवस्था से स्थापित होता है।

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