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Samastipur News: CBSE ने 9वीं और 10वीं के पाठ्यक्रम में मैथिली भाषा को किया शामिल

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सीबीएसई ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 से कक्षा 9वीं और 10वीं में मैथिली भाषा को विषय के रूप में शामिल करने का फैसला लिया है। इस निर्णय का मिथिलांचल में स्वागत हो रहा है।

समस्तीपुर/आलम की खबर:केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी CBSE ने देशभर के छात्रों, खासकर मिथिलांचल क्षेत्र के लिए एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है। बोर्ड ने आगामी शैक्षणिक सत्र 2026-27 से कक्षा 9वीं और 10वीं के पाठ्यक्रम में मैथिली भाषा को शामिल करने का निर्णय लिया है। इस फैसले के बाद शिक्षा जगत, साहित्यकारों, अभिभावकों और छात्रों के बीच खुशी का माहौल है। लंबे समय से क्षेत्रीय भाषाओं को स्कूल शिक्षा में अधिक महत्व देने की मांग उठती रही है और अब CBSE के इस कदम को उसी दिशा में एक मजबूत पहल माना जा रहा है।

मैथिली भाषा को माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर शामिल किए जाने को केवल एक शैक्षणिक निर्णय नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक पहचान और भाषाई विरासत को सम्मान देने वाला कदम माना जा रहा है। शिक्षाविदों का कहना है कि इससे लाखों छात्र अपनी मातृभाषा को औपचारिक रूप से पढ़ सकेंगे और अपनी जड़ों से और अधिक जुड़ाव महसूस करेंगे।

मिथिलांचल क्षेत्र अपनी समृद्ध भाषा, संस्कृति, लोककला, साहित्य और परंपराओं के लिए देशभर में प्रसिद्ध रहा है। मैथिली भाषा का साहित्यिक इतिहास भी काफी समृद्ध रहा है। महान कवि विद्यापति की रचनाओं से लेकर लोकगीतों और पारंपरिक संस्कृति तक मैथिली ने अपनी अलग पहचान बनाई है। ऐसे में CBSE द्वारा इस भाषा को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने को मिथिला के गौरव से जोड़कर देखा जा रहा है।

टेक्नो मिशन हाई स्कूल, मोहनपुर रोड के प्राचार्य एके लाल ने CBSE के इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह कदम छात्रों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में बेहद अहम भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि मैथिली केवल बोलचाल की भाषा नहीं है, बल्कि यह पूरे मिथिला क्षेत्र की पहचान है। स्कूल स्तर पर इसकी पढ़ाई शुरू होने से नई पीढ़ी अपने इतिहास, परंपराओं और साहित्य को बेहतर तरीके से समझ सकेगी।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में तेजी से बदलते सामाजिक माहौल में क्षेत्रीय भाषाओं को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। ऐसे में अगर स्कूलों में मैथिली की पढ़ाई शुरू होती है तो बच्चों में अपनी मातृभाषा के प्रति सम्मान और लगाव दोनों बढ़ेंगे। इससे भाषा संरक्षण को भी मजबूती मिलेगी।

CBSE के इस फैसले को लेकर अभिभावकों में भी उत्साह देखने को मिल रहा है। अभिभावकों का कहना है कि बच्चे अब अंग्रेजी और हिंदी के साथ अपनी मातृभाषा को भी शैक्षणिक रूप से पढ़ सकेंगे। इससे उनका मानसिक और भाषाई विकास बेहतर होगा। कई अभिभावकों ने कहा कि जब बच्चे अपनी भाषा में शिक्षा ग्रहण करते हैं तो उनकी समझने की क्षमता और आत्मविश्वास दोनों बढ़ते हैं।

सेंट्रल पब्लिक स्कूल के निदेशक सह प्राचार्य मो. आरिफ ने कहा कि मैथिली को भाषा विकल्प के रूप में शामिल करना बेहद सकारात्मक कदम है। उन्होंने कहा कि इससे छात्रों को बोर्ड परीक्षाओं में अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार विषय चुनने का अवसर मिलेगा। उन्होंने यह भी कहा कि मातृभाषा में पढ़ाई करने से बच्चों की अभिव्यक्ति क्षमता मजबूत होती है और वे पढ़ाई को अधिक सहज तरीके से समझ पाते हैं।

उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति में भी क्षेत्रीय और मातृभाषाओं को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया है। CBSE का यह फैसला उसी नीति की भावना के अनुरूप दिखाई देता है। इससे देश की विविध भाषाओं और संस्कृतियों को सम्मान देने का संदेश भी जाएगा।

इस फैसले से छात्रों के बीच भी काफी उत्साह है। छात्र-छात्राओं का कहना है कि अब उन्हें अपनी भाषा को केवल घर या समाज तक सीमित नहीं रखना पड़ेगा, बल्कि स्कूल स्तर पर भी उसे पढ़ने और समझने का अवसर मिलेगा। छात्रा प्रिया ने कहा कि मैथिली को पढ़ाई में शामिल किए जाने से उन्हें गर्व महसूस हो रहा है। उन्होंने कहा कि अब छात्र अपनी क्षेत्रीय भाषा को औपचारिक रूप से सीख सकेंगे, जिससे आगे चलकर प्रतियोगी परीक्षाओं, उच्च शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में भी नए अवसर खुल सकते हैं।

शिक्षाविदों का मानना है कि इस फैसले से मैथिली भाषा के शोध और साहित्य को भी नई दिशा मिलेगी। आने वाले समय में स्कूलों में मैथिली पढ़ाए जाने से इस भाषा के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की मांग बढ़ेगी। साथ ही नई किताबों, पाठ्य सामग्री और शोध कार्यों को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

भाषा विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी समाज की पहचान उसकी भाषा और संस्कृति से होती है। यदि नई पीढ़ी अपनी भाषा से दूर हो जाती है तो धीरे-धीरे सांस्कृतिक विरासत भी कमजोर होने लगती है। ऐसे में CBSE का यह फैसला केवल शिक्षा से जुड़ा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

मिथिलांचल के कई सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों ने भी इस निर्णय का स्वागत किया है। लोगों का कहना है कि लंबे समय से मैथिली को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक पहचान दिलाने की मांग उठती रही है। अब स्कूल शिक्षा में इसे शामिल किए जाने से भाषा को नई ऊर्जा और सम्मान मिलेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इसी तरह क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा दिया जाता रहा तो देश की भाषाई विविधता और अधिक मजबूत होगी। साथ ही छात्र अपनी संस्कृति से जुड़े रहते हुए आधुनिक शिक्षा भी प्राप्त कर सकेंगे। यह संतुलन भारत जैसे विविधताओं वाले देश के लिए बेहद जरूरी माना जाता है।

फिलहाल CBSE के इस फैसले ने मिथिलांचल के लोगों को गर्व महसूस कराने का काम किया है। आने वाले वर्षों में इसका प्रभाव शिक्षा, संस्कृति और भाषा संरक्षण के क्षेत्र में साफ तौर पर दिखाई दे सकता है। लोग उम्मीद जता रहे हैं कि यह निर्णय मैथिली भाषा को नई पहचान देने के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में भी अहम भूमिका निभाएगा।

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