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दरभंगा के बहेड़ी में अवैध अस्पतालों पर बड़ी कार्रवाई: मानवाधिकार आयोग की जांच में फर्जीवाड़ा उजागर, चार डॉक्टरों पर कार्रवाई और लिपिक निलंबित

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दरभंगा के बहेड़ी में अवैध और अमानक अस्पतालों के संचालन का बड़ा खुलासा हुआ है। मानवाधिकार आयोग के आदेश पर जांच में कई अनियमितताएं सामने आईं, जिसके बाद चार डॉक्टरों पर कार्रवाई और एक लिपिक को निलंबित किया गया।

दरभंगा/आलम की खबर:दरभंगा जिले के बहेड़ी इलाके में अवैध और मानक विहीन अस्पतालों के संचालन को लेकर बड़ा प्रशासनिक खुलासा सामने आया है, जहां मानवाधिकार आयोग के आदेश पर हुई विस्तृत जांच में न केवल गंभीर अनियमितताएं उजागर हुई हैं, बल्कि मरीजों की सुरक्षा को खतरे में डालने वाले चौंकाने वाले तथ्य भी सामने आए हैं। जांच रिपोर्ट के आधार पर जिला प्रशासन ने रंजीता मेमोरियल अस्पताल और मिथिलांचल अस्पताल सहित कई संस्थानों पर कार्रवाई का आदेश जारी किया है, वहीं चार चिकित्सकों पर भी आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है। इसके साथ ही सिविल सर्जन कार्यालय के एक लिपिक को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर विभागीय जांच शुरू कर दी गई है, जिससे पूरे स्वास्थ्य तंत्र में हड़कंप की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

जांच में यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि बहेड़ी बाजार क्षेत्र में लंबे समय से कई ऐसे अस्पताल संचालित हो रहे थे जो न तो मानक के अनुरूप थे और न ही उनके पास आवश्यक वैध दस्तावेज मौजूद थे। इतना ही नहीं, पूर्व में सील किए जा चुके कुछ अस्पतालों के संचालकों द्वारा नाम बदलकर फिर से नए प्रतिष्ठान शुरू करने की बात भी जांच में सत्य पाई गई, जिससे यह संकेत मिलता है कि स्थानीय स्तर पर निगरानी व्यवस्था में गंभीर चूक रही है। मानवाधिकार आयोग में दर्ज शिकायत के बाद यह पूरा मामला प्रकाश में आया, जिसके बाद जिला प्रशासन ने तत्काल जांच टीम गठित कर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करवाई।

जांच रिपोर्ट में रंजीता मेमोरियल अस्पताल और मिथिलांचल अस्पताल को केंद्र में रखते हुए कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। रिपोर्ट के अनुसार अस्पतालों में बिना पर्याप्त विशेषज्ञता वाले चिकित्सकों द्वारा शल्य चिकित्सा (ऑपरेशन) किए जाने की बात भी सामने आई है। जांच के दौरान यह पाया गया कि कुछ चिकित्सक केवल एमबीबीएस डिग्रीधारी थे, जबकि उनके पास सर्जरी से संबंधित आवश्यक विशेषज्ञ योग्यता नहीं थी, फिर भी ऑपरेशन जैसे गंभीर कार्य किए जा रहे थे। इससे मरीजों की जान को गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा था।

जांच टीम को दिए गए बयान और दस्तावेजों के अनुसार कई डॉक्टरों को ‘ऑन-कॉल जनरल सर्जन’ के रूप में कार्यरत बताया गया, जिनमें डा. आनंद कृष्ण, डा. नरेंद्र देव चौधरी, डा. अनिल कुमार यादव और डा. पंकज कुमार के नाम प्रमुख रूप से सामने आए हैं। हालांकि मौके पर जांच के दौरान इन चिकित्सकों की भूमिका और उपस्थिति को लेकर भी विरोधाभास पाया गया। कुछ डॉक्टरों ने केवल ओपीडी सेवा देने की बात कही, जबकि अस्पताल प्रबंधन द्वारा उन्हें सर्जरी से जोड़कर प्रस्तुत किया गया था।

रंजीता मेमोरियल अस्पताल के संचालक रोहित कुमार मंडल जांच के समय अस्पताल में मौजूद नहीं पाए गए और जब टीम ने पूछताछ की तो यह स्वीकार किया गया कि अस्पताल लगभग एक माह से संचालित किया जा रहा था। जांच में यह भी सामने आया कि 22 अप्रैल 2026 को दो मरीजों का ऑपरेशन किया गया था, जिनमें समस्तीपुर जिले की माया देवी और संजू कुमारी शामिल थीं। यह तथ्य भी सामने आया कि ऑपरेशन के समय उचित मानकों का पालन नहीं किया गया और विशेषज्ञ सर्जन की उपलब्धता पर भी सवाल उठे।

सबसे गंभीर पहलू यह रहा कि जांच के दौरान अस्पताल के पास कोई वैध दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे। संचालक द्वारा केवल यह बताया गया कि क्लीनिक एक्ट के तहत निबंधन के लिए आवेदन सिविल सर्जन कार्यालय में जमा किया गया है, लेकिन कोई स्वीकृति पत्र या अनुमति दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया जा सका। जांच टीम के पहुंचने से पहले ही अस्पताल संचालक द्वारा अस्पताल को रातों-रात बंद कर फरार हो जाने की बात भी सामने आई, जिससे संदेह और गहरा हो गया।

जांच रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ कि पहले से सील किए गए कुछ अस्पतालों से जुड़े आरोपित व्यक्ति नए अस्पतालों में फिर से कार्यरत पाए गए। विशेष रूप से फर्जी डॉक्टर मामलों में नामजद अभियुक्तों की संलिप्तता ने पूरे प्रकरण को और गंभीर बना दिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि स्वास्थ्य व्यवस्था में निगरानी की कमी और लापरवाही के कारण ऐसे अवैध नेटवर्क लगातार सक्रिय बने हुए हैं।

इसके अलावा मिथिलांचल अस्पताल की जांच में यह पाया गया कि भले ही उसका निबंधन क्लीनिक एक्ट के तहत वैध प्रतीत होता है, लेकिन अस्पताल की संरचना, ऑपरेशन थिएटर और चिकित्सा मानक पूरी तरह से नियमों के अनुरूप नहीं थे। जांच टीम ने इस अस्पताल की अनुमति रद्द करने की अनुशंसा भी की है।

पूरे मामले में सिविल सर्जन कार्यालय के लिपिक मनोज साह की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई, जिसके चलते उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है और विभागीय कार्रवाई शुरू की गई है। वहीं प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी पर भी लापरवाही के आरोप में कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

जिला प्रशासन ने सिविल सर्जन को निर्देश दिया है कि जांच रिपोर्ट के आधार पर सभी दोषियों पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए और कृत कार्रवाई की रिपोर्ट शीघ्र प्रस्तुत की जाए। साथ ही भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कड़ी निगरानी व्यवस्था लागू करने का निर्देश भी दिया गया है।

यह पूरा मामला न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे अवैध अस्पतालों का नेटवर्क मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ कर रहा है। प्रशासनिक कार्रवाई के बाद अब उम्मीद जताई जा रही है कि बहेड़ी क्षेत्र में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सख्ती बढ़ेगी और अवैध अस्पतालों पर पूरी तरह रोक लगाई जाएगी।

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