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रामेश्वर जूट मिल में सात महीने बाद सायरन, लेकिन कच्चे माल की कमी और 2010 से बकाया भुगतान पर मजदूरों का गुस्सा

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समस्तीपुर की रामेश्वर जूट मिल सात महीने बाद फिर चर्चा में है, जहां सायरन बजने के बावजूद कच्चे माल की कमी और 2010 से लंबित ईपीएफ-ग्रेच्युटी को लेकर मजदूरों में भारी नाराजगी है।

समस्तीपुर/आलम की खबर:समस्तीपुर जिले के औद्योगिक इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाली मुक्तापुर स्थित रामेश्वर जूट मिल एक बार फिर सुर्खियों में है। वर्षों से आर्थिक संकट और संचालन की अनिश्चितता से जूझ रही यह मिल सात महीने तक पूरी तरह बंद रहने के बाद जब अचानक सायरन की आवाज से गूंज उठी, तो मजदूरों और स्थानीय लोगों के बीच एक नई उम्मीद जगी, लेकिन यह उम्मीद बहुत जल्दी निराशा में बदल गई। सायरन बजने के साथ ही मिल को पुनः चालू करने की औपचारिक घोषणा तो कर दी गई, लेकिन जमीन पर स्थिति पहले जैसी ही बनी रही, जिससे मजदूरों में गहरा आक्रोश और असंतोष फैल गया।
मिल परिसर में आयोजित कार्यक्रम में प्रशासनिक अधिकारियों, श्रम विभाग के प्रतिनिधियों, प्रबंधन अधिकारियों और मजदूर यूनियन के नेताओं की मौजूदगी में सायरन बजाकर संचालन की शुरुआत का संदेश दिया गया। यह दृश्य प्रतीकात्मक रूप से मिल के पुनरुद्धार का संकेत जरूर लग रहा था, लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग थी। मजदूरों का कहना है कि यह पूरा आयोजन केवल दिखावे और औपचारिकता तक सीमित रहा, क्योंकि उत्पादन शुरू करने के लिए आवश्यक मूलभूत संसाधन ही उपलब्ध नहीं हैं।
सबसे गंभीर मुद्दा कच्चे जूट की अनुपलब्धता है, जो किसी भी जूट मिल के संचालन की पहली शर्त होती है। मजदूरों ने साफ तौर पर बताया कि मिल परिसर में न तो पर्याप्त कच्चा माल है और न ही उत्पादन को सुचारू रूप से शुरू करने की कोई ठोस योजना दिखाई देती है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर बिना कच्चे माल के मिल कैसे चलेगी और किस आधार पर इसे चालू बताया जा रहा है। कई मजदूरों ने इसे केवल “सायरन बजाने की रस्म” करार दिया है।
मजदूरों में यह भी चर्चा है कि मिल को समय-समय पर राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव के बीच खोला और बंद किया जाता रहा है। जब भी मजदूर अपने लंबित वेतन और बकाया भुगतान की मांग को लेकर आवाज उठाते हैं, तो मिल का संचालन ठप कर दिया जाता है। इससे मजदूरों की आजीविका पर सीधा असर पड़ता है और वे लगातार असुरक्षा के माहौल में जीने को मजबूर हैं। उनका कहना है कि जब तक नियमित उत्पादन, स्थायी काम और पारदर्शी प्रबंधन सुनिश्चित नहीं किया जाता, तब तक किसी भी उद्घाटन का कोई वास्तविक अर्थ नहीं है।
इस पूरे विवाद का सबसे दर्दनाक पहलू मजदूरों का लंबित ईपीएफ और ग्रेच्युटी भुगतान है, जो वर्ष 2010 से अब तक अटका हुआ है। पिछले लगभग 16 वर्षों से सैकड़ों मजदूर अपने हक की राशि के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कई ऐसे मजदूर भी हैं जो रिटायर हो चुके हैं या अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनके परिवार आज भी इस बकाया राशि की प्रतीक्षा कर रहे हैं। मजदूरों का आरोप है कि इस गंभीर मुद्दे पर न तो प्रबंधन ने गंभीरता दिखाई और न ही यूनियन स्तर पर कोई प्रभावी पहल की गई।
स्थानीय मजदूरों का कहना है कि कई मजदूर संगठन केवल नाम मात्र के लिए सक्रिय हैं और वास्तविक संघर्ष के बजाय प्रबंधन के साथ समझौते की स्थिति में नजर आते हैं। इससे मजदूरों का भरोसा लगातार कमजोर होता जा रहा है। मजदूरों की मांग है कि केवल बयानबाजी से काम नहीं चलेगा, बल्कि उनके अधिकारों की स्पष्ट और समयबद्ध पूर्ति होनी चाहिए।
सायरन बजने के बाद आयोजित औपचारिक कार्यक्रम में सैकड़ों मजदूर मौजूद थे, जिनमें लाल बाबू राय, शंकर राय, देवेंद्र पासवान, मुन्ना पासवान, रंजीत पासवान सहित कई पुराने मजदूर शामिल थे। कार्यक्रम के दौरान अधिकारियों ने एक-दूसरे को सम्मानित भी किया, गुलदस्ते दिए गए और औपचारिक संबोधन हुए, लेकिन मजदूरों के चेहरों पर कोई खुशी नहीं दिखी। उनके चेहरे केवल सवालों और अनिश्चितता से भरे हुए थे।
मजदूरों का स्पष्ट कहना है कि वास्तविक मिल वही होगी जहां उत्पादन नियमित हो, मजदूरों को समय पर वेतन मिले और उनका बकाया पूरी तरह से चुकता किया जाए। केवल सायरन बजाना या उद्घाटन समारोह करना किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। वर्तमान स्थिति में यह मिल मजदूरों के लिए रोजगार का साधन नहीं बल्कि संघर्ष और अनिश्चितता का प्रतीक बन चुकी है।
औद्योगिक विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसी भी जूट मिल को पुनः जीवित करना है तो सबसे पहले कच्चे माल की आपूर्ति, वित्तीय स्थिरता और मजदूरों के लंबित भुगतान का समाधान जरूरी है। इसके बिना कोई भी प्रयास केवल अस्थायी और प्रतीकात्मक रह जाएगा।रामेश्वर जूट मिल की मौजूदा स्थिति एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि क्या केवल औपचारिक उद्घाटन और सायरन बजाने से कोई उद्योग पुनर्जीवित हो सकता है? सात महीने बाद सायरन बजना निश्चित रूप से प्रतीकात्मक रूप से एक शुरुआत का संकेत हो सकता है, लेकिन जब उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चा माल ही उपलब्ध नहीं हो, तो यह शुरुआत वास्तविकता से ज्यादा भ्रम प्रतीत होती है।
सबसे गंभीर मुद्दा 2010 से लंबित ईपीएफ और ग्रेच्युटी भुगतान है, जो सीधे तौर पर मजदूरों के जीवन और उनके परिवारों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। इतने लंबे समय तक इस मुद्दे का समाधान न होना प्रशासनिक और प्रबंधन दोनों स्तरों पर गंभीर लापरवाही को दर्शाता है। मजदूरों का भरोसा लगातार टूट रहा है और वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह स्थिति और अधिक गंभीर रूप ले सकती है। केवल सायरन बजाना या कार्यक्रम आयोजित करना किसी भी औद्योगिक इकाई के पुनरुद्धार का विकल्प नहीं हो सकता। वास्तविक समाधान तभी संभव है जब पारदर्शिता, नियमित उत्पादन और मजदूरों के अधिकारों की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

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