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आरक्षण पर संतोष सुमन ने उठाया बड़ा सवाल, बोले- सबसे वंचित तक पहुंचे लाभ

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | मंत्री संतोष कुमार सुमन ने आरक्षण की समीक्षा और SC-ST के भीतर उप-वर्गीकरण की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आरक्षण खत्म करना नहीं, बल्कि उसका लाभ सबसे वंचित लोगों तक पहुंचाना उद्देश्य होना चाहिए।

पटना, 27 अगस्त। बिहार में आरक्षण को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज होने के आसार हैं। बिहार सरकार में मंत्री और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (से.) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संतोष कुमार सुमन ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण की जरूरत पर जोर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आरक्षण की समीक्षा की बात करने का अर्थ आरक्षण को समाप्त करना नहीं है। उनका जोर इस बात पर है कि आरक्षण का फायदा उस व्यक्ति और समुदाय तक पहुंचे, जो अब भी सामाजिक और आर्थिक रूप से पीछे है।
संतोष कुमार सुमन ने कहा कि आरक्षण व्यवस्था का मूल उद्देश्य समाज के वंचित वर्गों को आगे बढ़ाना है। ऐसे में समय-समय पर यह देखना भी जरूरी है कि इस व्यवस्था का लाभ किन वर्गों तक पहुंच रहा है और कौन से समुदाय अब भी अपेक्षित अवसरों से दूर हैं।
उनके बयान ने बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय और आरक्षण के मुद्दे को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। खास तौर पर इसलिए क्योंकि संतोष सुमन खुद दलित समाज से आने वाले प्रमुख राजनीतिक नेता हैं और राज्य सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
आरक्षण खत्म करने की बात नहीं
संतोष सुमन ने अपने बयान में यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि आरक्षण की समीक्षा को आरक्षण खत्म करने की मांग के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उद्देश्य संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसके लाभ को ज्यादा प्रभावी और न्यायपूर्ण बनाना है।
उनके मुताबिक यदि आरक्षण का लाभ समाज के भीतर कुछ वर्गों तक ज्यादा पहुंच रहा है और कुछ समूह लगातार पीछे हैं, तो इस अंतर पर विचार किया जाना चाहिए। इसी आधार पर उन्होंने SC-ST आरक्षण में उप-वर्गीकरण का समर्थन किया।
संतोष सुमन का तर्क है कि आरक्षित वर्ग के भीतर भी सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। इसलिए सबसे अधिक वंचित लोगों की पहचान कर उन्हें अवसर उपलब्ध कराने पर चर्चा होना स्वाभाविक है।
SC-ST के भीतर उप-वर्गीकरण की वकालत
मंत्री ने कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को पूरी तरह एक समान सामाजिक स्थिति वाला समूह मानना सही नहीं होगा। इन वर्गों के भीतर भी कई समुदाय ऐसे हैं, जिन्हें शिक्षा, रोजगार और आर्थिक अवसरों में अपेक्षित हिस्सेदारी नहीं मिल पाई है।
ऐसे में उनका सवाल है कि अगर किसी आरक्षित वर्ग के भीतर ही अवसरों का लाभ असमान रूप से पहुंच रहा है, तो सबसे पीछे रह गए समूहों तक लाभ पहुंचाने के लिए उप-वर्गीकरण पर विचार क्यों नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी पहले भी SC-ST आरक्षण में उप-वर्गीकरण के पक्ष में रही है और इस मुद्दे पर उसका रुख स्पष्ट है।
यह बहस सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद भी महत्वपूर्ण हो गई है, जिसमें अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण के लिए राज्यों की शक्ति को लेकर महत्वपूर्ण व्यवस्था दी गई थी। हालांकि किसी भी व्यवस्था को लागू करने के लिए संवैधानिक प्रावधानों और ठोस आंकड़ों का ध्यान रखना जरूरी होगा।
'79 साल बाद आंकड़ों पर सवाल क्यों नहीं'
संतोष सुमन ने आजादी के बाद आरक्षण व्यवस्था की लंबी अवधि का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि इतने वर्षों के बाद यह जानने की कोशिश करना गलत कैसे हो सकता है कि इसका लाभ किन वर्गों को कितना मिला।
उनके मुताबिक अगर आरक्षण का उद्देश्य वंचित समुदायों को मुख्यधारा में लाना है, तो यह आकलन भी होना चाहिए कि कितने लोग इस व्यवस्था के जरिए आगे आए और कौन से समुदाय अभी भी उसी स्थिति में खड़े हैं।
उनका कहना है कि किसी भी नीति की प्रभावशीलता समझने के लिए उसके परिणामों का अध्ययन किया जाना जरूरी है। इसी आधार पर आरक्षण के लाभ के वितरण को लेकर भी आंकड़ों और वास्तविक स्थिति का अध्ययन किया जा सकता है।
सामाजिक न्याय को लेकर अलग नजरिया
संतोष सुमन ने आरक्षण को केवल सरकारी नौकरी या शैक्षणिक संस्थानों में सीटों से जोड़कर देखने के बजाय इसे सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा मुद्दा बताया।
उनके अनुसार समाज के कमजोर वर्गों को आगे बढ़ाने के लिए अवसरों की उपलब्धता जरूरी है। यदि किसी समुदाय को लंबे समय तक पर्याप्त अवसर नहीं मिल पा रहे हैं तो उसके लिए विशेष ध्यान देने की जरूरत होगी।
उन्होंने सामान्य वर्ग में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए EWS और पिछड़े वर्गों में पिछड़ा-अतिपिछड़ा जैसी अलग-अलग श्रेणियों का उदाहरण देते हुए कहा कि सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर वर्गीकरण की व्यवस्था पहले से मौजूद है।
इसी तर्क के आधार पर उन्होंने SC-ST के भीतर भी उन समुदायों की पहचान करने की जरूरत बताई, जो आरक्षण के बावजूद अपेक्षाकृत पीछे रह गए हैं।
बिहार की राजनीति में बढ़ सकती है हलचल
संतोष सुमन के बयान का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि बिहार में सामाजिक न्याय और आरक्षण लंबे समय से चुनावी राजनीति के प्रमुख मुद्दे रहे हैं।
जातीय सर्वेक्षण के बाद राज्य में अलग-अलग सामाजिक समूहों की हिस्सेदारी, सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व और आरक्षण का लाभ जैसे सवाल लगातार राजनीतिक चर्चा में रहे हैं।
ऐसे में SC-ST के भीतर उप-वर्गीकरण का मुद्दा सामने आने से दलित समाज के भीतर भी नई चर्चा शुरू हो सकती है। राजनीतिक दलों के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण होगा कि वे इस प्रस्ताव को किस नजरिए से देखते हैं।
एक तरफ आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने की मांग करने वाले समूह हैं, तो दूसरी ओर आरक्षित वर्गों के भीतर अधिक वंचित समुदायों को अलग अवसर देने की मांग भी सामने आती रही है।
सबसे जरूरी है पारदर्शी प्रक्रिया
आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण का सवाल जितना राजनीतिक है, उतना ही संवैधानिक और प्रशासनिक भी है। यदि इस दिशा में आगे बढ़ना है तो सबसे पहले यह तय करना होगा कि वंचित और अपेक्षाकृत अधिक लाभ पाने वाले समूहों की पहचान किस आधार पर की जाएगी।
इसके लिए शिक्षा, रोजगार, सरकारी प्रतिनिधित्व और सामाजिक-आर्थिक स्थिति से जुड़े विश्वसनीय आंकड़ों की जरूरत होगी। बिना ठोस अध्ययन के किसी भी तरह का वर्गीकरण विवाद पैदा कर सकता है।
इसलिए संतोष सुमन की मांग को लेकर आगे की बहस केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहने के बजाय आंकड़ों और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर आगे बढ़ती है या नहीं, यह महत्वपूर्ण होगा।
आरक्षण पर बहस में नया सवाल
संतोष सुमन के बयान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि उन्होंने आरक्षण को खत्म करने की बजाय उसके लाभ के वितरण पर सवाल उठाया है।
उनका कहना है कि आरक्षण तभी अपने उद्देश्य को पूरा करेगा, जब इसका लाभ उन लोगों तक पहुंचे जो सामाजिक रूप से सबसे अधिक पीछे हैं। इसके लिए आरक्षित वर्गों के भीतर मौजूद असमानताओं को समझना जरूरी है।
अब इस मुद्दे पर बिहार के दूसरे राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। यदि बहस आगे बढ़ती है तो यह केवल आरक्षण की सीमा या अवधि का सवाल नहीं रहेगा, बल्कि आरक्षण के भीतर लाभ के बंटवारे और प्रतिनिधित्व का प्रश्न भी केंद्र में आ सकता है।
बिहार की राजनीति में इसका असर कितना व्यापक होगा, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। फिलहाल संतोष सुमन ने आरक्षण पर ऐसी बहस जरूर शुरू कर दी है, जिसमें सवाल आरक्षण को बनाए रखने या खत्म करने से आगे बढ़कर आरक्षण का लाभ किसे और कितनी प्रभावी तरीके से मिल रहा है, इस पर केंद्रित हो गया है।
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आरक्षण का उद्देश्य आखिरी व्यक्ति तक पहुंचना
आरक्षण को लेकर होने वाली बहस अक्सर राजनीतिक नारों तक सीमित हो जाती है। लेकिन संतोष सुमन ने जो सवाल उठाया है, उसका एक व्यावहारिक पक्ष भी है—क्या आरक्षण का लाभ आरक्षित वर्गों के भीतर सभी जरूरतमंद समुदायों तक समान रूप से पहुंच रहा है?
इस सवाल का जवाब भावनाओं से नहीं, बल्कि आंकड़ों और निष्पक्ष अध्ययन से मिलना चाहिए। यदि कोई समुदाय लगातार पीछे है तो उसकी स्थिति सुधारने के लिए नीति बनाना जरूरी है। लेकिन ऐसी किसी भी नीति में संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक संतुलन का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए।
आरक्षण का उद्देश्य अवसरों की असमानता को कम करना है। इसलिए बहस का केंद्र किसी वर्ग को लाभ से वंचित करना नहीं, बल्कि वास्तव में पीछे रह गए लोगों तक अवसर पहुंचाना होना चाहिए।
यदि बिहार इस मुद्दे पर आगे कोई पहल करता है तो सबसे जरूरी होगा कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो और उसके आधार सार्वजनिक किए जाएं। तभी आरक्षण को लेकर उठने वाली नई बहस सामाजिक न्याय की दिशा में सार्थक कदम बन सकेगी।

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