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AI कंटेंट पर सख्त नियम, अब हर वीडियो-फोटो पर दिखेगा स्पष्ट लेबल

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भारत सरकार ने AI और डीपफेक के दुरुपयोग को रोकने के लिए नए नियम प्रस्तावित किए हैं। अब AI कंटेंट पर लगातार लेबल दिखाना अनिवार्य हो सकता है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के बीच इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए सरकार अब सख्त कदम उठाने जा रही है। Ministry of Electronics and Information Technology (MeitY) ने AI से तैयार सामग्री को लेकर नए नियमों का प्रस्ताव जारी किया है, जिसके तहत अब किसी भी AI-जनित कंटेंट पर स्पष्ट और लगातार दिखाई देने वाला लेबल अनिवार्य किया जा सकता है। इस ड्राफ्ट को सार्वजनिक सुझाव के लिए जारी किया गया है और 7 मई तक आम लोगों, विशेषज्ञों और उद्योग से जुड़े पक्षों से प्रतिक्रिया मांगी गई है।

लेबलिंग नियम में बड़ा बदलाव

सरकार के नए प्रस्ताव में सबसे अहम बदलाव AI कंटेंट की लेबलिंग को लेकर किया गया है। पहले जहां केवल “प्रमुख रूप से दिखाई देने वाला” लेबल पर्याप्त माना जाता था, अब इसे और सख्त बनाते हुए कहा गया है कि यह लेबल पूरे कंटेंट के दौरान लगातार और साफ तौर पर दिखाई देना चाहिए।

इसका मतलब है कि चाहे वीडियो हो, फोटो हो या कोई अन्य डिजिटल कंटेंट—अगर वह AI से तैयार किया गया है, तो उसे दर्शकों से छिपाया नहीं जा सकेगा। इससे यूजर्स को यह साफ जानकारी मिल सकेगी कि वे जो देख रहे हैं, वह वास्तविक है या कृत्रिम रूप से बनाया गया है।

हर यूजर पर लागू होंगे नियम

इस प्रस्ताव की एक खास बात यह भी है कि यह नियम केवल बड़ी टेक कंपनियों या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स तक सीमित नहीं रहेगा। अगर कोई आम यूजर भी AI टूल्स का इस्तेमाल करके कंटेंट बनाता है या शेयर करता है, तो उसे भी इन नियमों का पालन करना होगा।

यानी अब जिम्मेदारी सिर्फ कंपनियों की नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की होगी जो डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सामग्री अपलोड करता है।

IT नियम 2026 के तहत सख्ती

सरकार ने पहले ही Information Technology Rules 2026 के तहत AI और डीपफेक को नियंत्रित करने के लिए नए प्रावधान लागू किए हैं, जो 20 फरवरी 2026 से प्रभावी हैं। इन नियमों के तहत AI से तैयार कंटेंट की पहचान और नियंत्रण को कानूनी रूप से मजबूत किया गया है।

डिजिटल फिंगरप्रिंटिंग और मेटाडेटा की भूमिका

नए नियमों में मेटाडेटा और डिजिटल फिंगरप्रिंटिंग को अहम भूमिका दी गई है। इसे किसी भी डिजिटल फाइल का ‘डिजिटल डीएनए’ कहा जा सकता है। इसके जरिए यह पता लगाया जा सकेगा कि कंटेंट कब, कहां और किस AI टूल से बनाया गया है।

अगर किसी AI कंटेंट का दुरुपयोग होता है, तो जांच एजेंसियां इसी जानकारी के आधार पर उसके स्रोत तक पहुंच सकती हैं। साथ ही प्लेटफॉर्म्स को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कोई यूजर इस डेटा के साथ छेड़छाड़ न कर सके।

लेबल हटाने पर सख्त कार्रवाई

सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि AI कंटेंट पर लगाए गए लेबल या वॉटरमार्क को हटाना अब गैर-कानूनी माना जाएगा। अगर कोई ऐसा करने की कोशिश करता है, तो प्लेटफॉर्म्स को ऐसी तकनीक अपनानी होगी जिससे कंटेंट को तुरंत ब्लॉक या डिलीट किया जा सके।

यह कदम उन मामलों को रोकने के लिए उठाया गया है, जहां लोग एडिटिंग के जरिए AI कंटेंट को असली बताकर फैलाते हैं।

यूजर डिक्लेरेशन भी जरूरी

50 लाख से अधिक यूजर्स वाले प्लेटफॉर्म्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि कंटेंट अपलोड करने वाला व्यक्ति यह घोषित करे कि उसका कंटेंट AI-जनित है या नहीं।

इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और गलत जानकारी फैलाने की संभावना कम होगी। अगर कोई यूजर गलत जानकारी देता है, तो उसकी जिम्मेदारी तय की जा सकेगी।

तीन घंटे में हटाना होगा आपत्तिजनक कंटेंट

नए नियमों के तहत सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी और बढ़ा दी गई है। अब किसी भी आपत्तिजनक या गैर-कानूनी कंटेंट की शिकायत मिलने के बाद उसे अधिकतम तीन घंटे के भीतर हटाना होगा।

पहले यह समय सीमा 36 घंटे थी, जिसे घटाकर काफी कम कर दिया गया है, ताकि गलत जानकारी के फैलाव को तेजी से रोका जा सके।

डीपफेक: सबसे बड़ा खतरा

Deepfake तकनीक आज के समय में सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। इसमें AI और मशीन लर्निंग का इस्तेमाल करके किसी व्यक्ति के चेहरे या आवाज को इस तरह बदल दिया जाता है कि वह पूरी तरह असली लगता है।

इस तकनीक का इस्तेमाल फिल्मों और मनोरंजन के लिए तो किया जाता है, लेकिन इसका गलत इस्तेमाल गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है।

दुरुपयोग के गंभीर परिणाम

डीपफेक के जरिए फर्जी वीडियो बनाकर लोगों को गुमराह किया जा सकता है। इससे चुनावों को प्रभावित करने, सामाजिक तनाव बढ़ाने और लोगों की छवि खराब करने जैसे मामले सामने आ चुके हैं।

इसके अलावा साइबर ठग किसी व्यक्ति की आवाज की नकल करके आर्थिक धोखाधड़ी भी कर सकते हैं। वहीं, महिलाओं और सेलिब्रिटीज के खिलाफ ब्लैकमेलिंग और फर्जी कंटेंट बनाने के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं।

सरकार का उद्देश्य क्या है?

सरकार का कहना है कि इन नियमों का मकसद एक ऐसा डिजिटल इकोसिस्टम तैयार करना है, जो सुरक्षित, भरोसेमंद और जवाबदेह हो।

AI तकनीक का सही इस्तेमाल समाज के लिए फायदेमंद हो सकता है, लेकिन इसके गलत उपयोग को रोकना भी उतना ही जरूरी है। यही कारण है कि सरकार इस दिशा में सख्त कदम उठा रही है।

आगे क्या होगा?

7 मई तक इस प्रस्ताव पर जनता और विशेषज्ञों से सुझाव मांगे गए हैं। इसके बाद सरकार इन सुझावों के आधार पर अंतिम नियम तैयार करेगी।

यह माना जा रहा है कि आने वाले समय में AI और डिजिटल कंटेंट को लेकर और भी सख्त नियम लागू हो सकते हैं, जिससे इंटरनेट की दुनिया को अधिक सुरक्षित बनाया जा सके।

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