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AI Cyber Attack Alert: AI की मदद से बढ़ रहे साइबर हमले, CERT-In ने जारी की बड़ी चेतावनी

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भारत की साइबर सुरक्षा एजेंसी CERT-In ने AI आधारित साइबर हमलों को लेकर बड़ी चेतावनी जारी की है। जानिए कैसे हैकर्स Generative AI और LLMs का इस्तेमाल कर रहे हैं और कंपनियों को क्या नए सुरक्षा निर्देश दिए गए हैं।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI आज दुनिया की सबसे तेजी से आगे बढ़ती तकनीकों में शामिल हो चुका है। मोबाइल फोन से लेकर बैंकिंग, हेल्थ, एजुकेशन, बिजनेस और सरकारी कामकाज तक AI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। यह तकनीक लोगों की जिंदगी आसान बना रही है, लेकिन इसके साथ एक नया और खतरनाक खतरा भी तेजी से सामने आ रहा है। अब साइबर अपराधी भी AI का इस्तेमाल कर पहले से ज्यादा शातिर और हाईटेक हमले कर रहे हैं। भारत सरकार की साइबर सुरक्षा एजेंसी CERT-In ने इस खतरे को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। एजेंसी का कहना है कि AI आधारित साइबर हमले आने वाले समय में देश की डिजिटल सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकते हैं।

CERT-In की ताजा रिपोर्ट के अनुसार साइबर अपराधियों ने अब पारंपरिक हैकिंग से आगे बढ़कर आधुनिक AI टूल्स का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। जनरेटिव AI, लार्ज लैंग्वेज मॉडल यानी LLMs और ऑटोनॉमस एजेंट्स जैसे उन्नत डिजिटल टूल्स की मदद से हैकर्स अब किसी भी सिस्टम की कमजोरियां बेहद तेजी से खोज रहे हैं। पहले जहां किसी नेटवर्क की खामी ढूंढने में कई दिन लग जाते थे, अब AI की मदद से यह काम कुछ मिनटों में पूरा हो रहा है।

एजेंसी ने बताया कि AI आधारित साइबर हमलों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये हमले लगातार खुद को बदलते रहते हैं। यानी जैसे ही कोई सुरक्षा सिस्टम उन्हें रोकने की कोशिश करता है, वैसे ही ये हमले अपनी रणनीति बदल लेते हैं। यही वजह है कि पुराने एंटीवायरस और पारंपरिक सिक्योरिटी सिस्टम अब पहले जितने प्रभावी नहीं रह गए हैं।

CERT-In की रिपोर्ट में फिशिंग अटैक को लेकर भी गंभीर चिंता जताई गई है। साइबर अपराधी अब AI की मदद से बेहद असली दिखने वाले फर्जी ईमेल, मैसेज और वेबसाइट तैयार कर रहे हैं। पहले फर्जी ईमेल में भाषा संबंधी गलतियां या संदिग्ध लिंक आसानी से पहचान में आ जाते थे, लेकिन अब AI आधारित फिशिंग मैसेज इतने प्रोफेशनल और वास्तविक दिखते हैं कि आम लोग आसानी से उनके झांसे में आ सकते हैं। यही कारण है कि ऑनलाइन बैंकिंग फ्रॉड, डेटा चोरी और डिजिटल ठगी के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है।

रिपोर्ट के अनुसार AI आधारित एडैप्टिव मालवेयर भी साइबर सुरक्षा एजेंसियों के लिए नई चुनौती बन चुके हैं। ये मालवेयर सुरक्षा सिस्टम को देखकर अपना व्यवहार बदल लेते हैं और कई बार एंटीवायरस को पूरी तरह चकमा दे देते हैं। साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में ऐसे स्मार्ट वायरस और ज्यादा खतरनाक हो सकते हैं।

आज लगभग हर बड़ी कंपनी इंटरनेट, क्लाउड सर्वर, सॉफ्टवेयर सप्लाई चेन और AI प्लेटफॉर्म्स से जुड़ी हुई है। ऐसे में किसी एक सिस्टम में छोटी सी कमजोरी भी पूरे नेटवर्क को खतरे में डाल सकती है। कई कंपनियां थर्ड पार्टी सॉफ्टवेयर और क्लाउड सर्विस का इस्तेमाल करती हैं, जिससे साइबर हमलों का जोखिम और ज्यादा बढ़ जाता है। CERT-In ने साफ कहा है कि अब केवल फायरवॉल और पुराने सुरक्षा मॉडल के भरोसे साइबर हमलों को रोकना संभव नहीं होगा।

एजेंसी ने कंपनियों को सख्त निर्देश देते हुए कहा है कि उन्हें लगातार अपने सिस्टम की निगरानी करनी होगी। इंटरनेट से जुड़े सभी एसेट्स, क्लाउड प्लेटफॉर्म और API की नियमित स्कैनिंग बेहद जरूरी होगी। किसी भी संदिग्ध गतिविधि को नजरअंदाज करना कंपनियों के लिए भारी नुकसान का कारण बन सकता है।

CERT-In ने यह भी कहा है कि कंपनियों को अपने डिजिटल जोखिमों की प्राथमिकता तय करनी चाहिए। जिन सिस्टम्स का सीधा संबंध आम जनता या महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर से है, उन्हें सबसे पहले सुरक्षित करना होगा। बैंकिंग, हेल्थ, पावर, टेलीकॉम और सरकारी सेवाओं से जुड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को सबसे संवेदनशील माना गया है।

रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चर्चा ‘12 घंटे के नियम’ को लेकर हो रही है। एजेंसी ने कहा है कि यदि किसी महत्वपूर्ण सिस्टम में कोई गंभीर सुरक्षा खामी मिलती है तो उसे अधिकतम 12 घंटे के भीतर ठीक करना जरूरी होगा। वहीं अन्य हाई-रिस्क कमजोरियों को 1 से 5 दिनों के भीतर सुधारने के निर्देश दिए गए हैं। CERT-In का मानना है कि किसी भी डिजिटल कमजोरी को लंबे समय तक नजरअंदाज करना साइबर अपराधियों को खुला मौका देने जैसा होगा।

अगर किसी खतरे का समाधान तुरंत उपलब्ध नहीं हो पाता है तो एजेंसी ने प्रभावित सिस्टम को अस्थायी रूप से नेटवर्क से अलग करने की सलाह दी है। साथ ही बाहरी एक्सेस को सीमित करने और निगरानी को ज्यादा मजबूत बनाने के निर्देश दिए गए हैं। इससे साइबर हमले के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

CERT-In ने सॉफ्टवेयर सप्लाई चेन से जुड़े खतरों पर भी चिंता जताई है। आज कई कंपनियां अलग-अलग थर्ड पार्टी सॉफ्टवेयर और डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल करती हैं। यदि किसी एक सप्लायर का सिस्टम कमजोर होता है तो उसका असर पूरी डिजिटल चेन पर पड़ सकता है। यही वजह है कि एजेंसी ने Software Bill of Materials यानी SBOM जैसे सुरक्षा फ्रेमवर्क अपनाने की सलाह दी है।

इसके अलावा AI Bill of Materials (AIBOM), Quantum Bill of Materials (QBOM) और Cryptographic Bill of Materials (CBOM) जैसे आधुनिक फ्रेमवर्क को भी जरूरी बताया गया है। इनकी मदद से कंपनियां यह समझ पाएंगी कि उनके सिस्टम में कौन-कौन सी तकनीक इस्तेमाल हो रही है, वे कितनी सुरक्षित हैं और थर्ड पार्टी तकनीकों से क्या खतरे मौजूद हैं।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में AI आधारित साइबर अपराध और तेजी से बढ़ सकते हैं। Deepfake वीडियो, AI Voice Cloning और ऑटोमेटेड हैकिंग सिस्टम भविष्य में बड़े वित्तीय और राष्ट्रीय सुरक्षा संकट का कारण बन सकते हैं। कई मामलों में अपराधी किसी व्यक्ति की आवाज तक कॉपी कर लोगों को ठगी का शिकार बना रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कंपनियों ही नहीं, बल्कि आम इंटरनेट यूजर्स को भी सतर्क रहने की जरूरत है। किसी अनजान लिंक पर क्लिक करने से बचना चाहिए। संदिग्ध ईमेल या मैसेज का जवाब नहीं देना चाहिए। मजबूत पासवर्ड का इस्तेमाल करना और टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन चालू रखना बेहद जरूरी हो गया है। क्योंकि AI आधारित साइबर अपराध अब केवल बड़े संस्थानों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि आम लोगों को भी सीधे निशाना बना रहे हैं।

भारत समेत पूरी दुनिया में AI तकनीक तेजी से आगे बढ़ रही है। लेकिन इसके साथ साइबर सुरक्षा की चुनौतियां भी लगातार गंभीर होती जा रही हैं। ऐसे में सरकार, कंपनियों और आम लोगों को मिलकर डिजिटल सुरक्षा को मजबूत करना होगा। तकनीक जितनी तेजी से बदल रही है, सुरक्षा उपायों को भी उतनी ही तेजी से अपडेट करना समय की सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है।

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