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सेबी चेयरमैन का बड़ा बयान: कमोडिटी डेरिवेटिव्स में बैंक-बीमा की एंट्री पर आरबीआई और आईआरडीएआई सख्त, सीकेवाईसी 2.0 जुलाई तक संभव

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सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने कहा कि आरबीआई और आईआरडीएआई अभी बैंकों व बीमा कंपनियों को कमोडिटी डेरिवेटिव्स बाजार में अनुमति देने के पक्ष में नहीं हैं। सीकेवाईसी 2.0 का ढांचा जुलाई तक तैयार हो सकता है।

भारतीय पूंजी बाजार को लेकर एक महत्वपूर्ण बयान सामने आया है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि फिलहाल बैंक और बीमा कंपनियों को कमोडिटी डेरिवेटिव्स बाजार में शामिल करने की अनुमति देने के पक्ष में देश के प्रमुख नियामक संस्थान नहीं हैं। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) में आयोजित आईएमसी कैपिटल मार्केट्स कॉन्फ्रेंस के दौरान सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने इस मुद्दे पर विस्तार से अपनी बात रखी और बताया कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDAI) इस दिशा में अभी सहज स्थिति में नहीं हैं।

उन्होंने कहा कि यह केवल एक तकनीकी या नीतिगत निर्णय नहीं है, बल्कि इसके पीछे वित्तीय स्थिरता और जोखिम प्रबंधन से जुड़े गहरे कारण हैं। खासकर बीमा कंपनियों के मॉडल को देखते हुए यह चिंता और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि बीमा क्षेत्र लंबी अवधि के सुरक्षित निवेश पर आधारित होता है। ऐसे में अत्यधिक उतार-चढ़ाव वाले कमोडिटी डेरिवेटिव्स जैसे बाजारों में उनकी भागीदारी से जोखिम बढ़ सकता है।

नियामकों की चिंता और बाजार संतुलन का सवाल

सेबी चेयरमैन ने साफ किया कि इस विषय पर सेबी की ओर से आरबीआई और आईआरडीएआई के साथ कई दौर की चर्चा की गई, लेकिन अभी तक सकारात्मक सहमति नहीं बन सकी है। दोनों नियामकों का मानना है कि इस समय बैंकों और बीमा कंपनियों को इस अस्थिर और उच्च जोखिम वाले सेगमेंट में प्रवेश की अनुमति देना उचित नहीं होगा।

उन्होंने संकेत दिया कि यह केवल प्रतिबंध का मामला नहीं है, बल्कि वित्तीय प्रणाली की सुरक्षा और स्थिरता से जुड़ा मुद्दा है। कमोडिटी डेरिवेटिव्स बाजार में कीमतों का तेज उतार-चढ़ाव, वैश्विक घटनाओं का प्रभाव और सट्टेबाजी जैसी गतिविधियां अक्सर बड़े जोखिम पैदा करती हैं, जिन्हें नियंत्रित करना आवश्यक है।

एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग और एआई पर बढ़ती चिंता

इसी सम्मेलन के दौरान तुहिन कांत पांडे ने डिजिटल और तकनीकी जोखिमों पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज के समय में एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग इतनी तेज हो चुकी है कि यह मानव नियंत्रण से कहीं आगे निकल जाती है। इससे बाजार में अचानक बड़े उतार-चढ़ाव की स्थिति पैदा हो सकती है।

उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि डिजिटल प्लेटफॉर्म जहां एक ओर वित्तीय सेवाओं को आसान बनाते हैं, वहीं दूसरी ओर धोखाधड़ी और साइबर अपराध के नए रास्ते भी खोलते हैं। खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित टूल्स के आने से यह खतरा और बढ़ गया है। AI जहां कमजोरियों की पहचान करने और बाजार विश्लेषण में मदद कर सकता है, वहीं इसका गलत इस्तेमाल बड़े पैमाने पर वित्तीय धोखाधड़ी का कारण भी बन सकता है।

सीकेवाईसी 2.0: एकीकृत वित्तीय पहचान की दिशा में बड़ा कदम

सेबी चेयरमैन ने अपने संबोधन में Central KYC (CKYC) 2.0 परियोजना पर भी अपडेट दिया। उन्होंने बताया कि यह परियोजना अभी विकास के चरण में है और इसका उद्देश्य पूरे वित्तीय क्षेत्र में एक समान और एकीकृत केवाईसी प्रणाली लागू करना है।

इस प्रणाली के लागू होने से निवेशकों को अलग-अलग वित्तीय संस्थानों में बार-बार KYC प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ेगा। यह परियोजना सेंट्रल रजिस्ट्री ऑफ सिक्योरिटाइजेशन एसेट रिकंस्ट्रक्शन एंड सिक्योरिटी इंटरेस्ट (CERSAI) के नेतृत्व में आगे बढ़ रही है, जिसमें विभिन्न नियामक संस्थानों के सुझाव शामिल किए जा रहे हैं।

सेबी ने हाल ही में CERSAI के साथ बैठक कर प्रमुख तकनीकी और नियामकीय मुद्दों की पहचान की है। उम्मीद जताई जा रही है कि जुलाई 2026 के अंत तक सीकेवाईसी 2.0 का पूरा ढांचा तैयार कर लिया जाएगा, जिससे भारत के वित्तीय ढांचे में पारदर्शिता और सुगमता दोनों बढ़ेगी।

भारत का पूंजी बाजार वैश्विक स्तर पर मजबूत स्थिति में

सेबी चेयरमैन ने अपने बयान में यह भी कहा कि भारत का पूंजी बाजार अब वैश्विक निवेशकों के लिए एक मजबूत और आकर्षक गंतव्य बनता जा रहा है। मजबूत मैक्रोइकोनॉमिक स्थिति, बढ़ता निवेशक आधार और डिजिटल वित्तीय ढांचे का विस्तार भारत को एक प्रतिस्पर्धी बाजार के रूप में स्थापित कर रहा है।

उन्होंने कहा कि आने वाले समय में नियामकीय सुधार और तकनीकी नवाचार भारत के पूंजी बाजार को और अधिक सशक्त बनाएंगे, लेकिन इसके साथ ही जोखिम प्रबंधन और सुरक्षा उपायों पर भी समान रूप से ध्यान देना जरूरी होगा।

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