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पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 283 दारोगा अभ्यर्थियों की नियुक्ति पर रोक, एकलपीठ का आदेश पलटा

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पटना हाईकोर्ट ने 283 दारोगा अभ्यर्थियों की नियुक्ति पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने एकलपीठ का आदेश पलटते हुए कहा कि 133 सुप्रीम कोर्ट नियुक्त अभ्यर्थियों से तुलना नहीं हो सकती।

पटना/आलम की खबर:बिहार पुलिस में दारोगा बनने का सपना देख रहे 283 अभ्यर्थियों को पटना हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने उनकी नियुक्ति पर रोक लगाते हुए एकलपीठ के पहले दिए गए आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया है। इस फैसले के बाद भर्ती प्रक्रिया से जुड़े लंबे समय से चल रहे विवाद में एक नया मोड़ आ गया है।

हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस संगम कुमार साहू और जस्टिस हरीश कुमार शामिल थे, ने यह स्पष्ट किया कि इस मामले में समानता के आधार पर नियुक्ति की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।

एकलपीठ के आदेश को खंडपीठ ने किया निरस्त

पहले एकलपीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि मेडिकल जांच में फिट पाए गए 283 अभ्यर्थियों को छह सप्ताह के भीतर दारोगा पद पर नियुक्त किया जाए। लेकिन राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती देते हुए डबल बेंच में अपील दाखिल की थी।

लंबी सुनवाई के बाद मंगलवार को हाईकोर्ट ने करीब 42 पन्नों का विस्तृत आदेश जारी करते हुए एकलपीठ के फैसले को पलट दिया और नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगा दी।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से तुलना को बताया गलत

कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि जिन 133 अभ्यर्थियों की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत की गई थी, उनकी तुलना इन 283 अभ्यर्थियों से नहीं की जा सकती।

खंडपीठ ने यह भी कहा कि यह मामला पूरी तरह अलग परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है, इसलिए समानता के आधार पर नियुक्ति का दावा स्वीकार्य नहीं है।

भर्ती प्रक्रिया का लंबा इतिहास

यह मामला विज्ञापन संख्या 704/2004 से जुड़ा हुआ है, जिसके तहत बिहार सरकार ने 1510 सब-इंस्पेक्टर पदों पर भर्ती निकाली थी।

इस भर्ती प्रक्रिया में:

2006 में शारीरिक परीक्षा हुई

2008 में लिखित परीक्षा आयोजित हुई

2008 में ही परिणाम घोषित किया गया

बाद में प्रश्न पत्र में त्रुटियों और पुनर्मूल्यांकन को लेकर विवाद खड़ा हुआ, जिसके चलते कई अभ्यर्थियों की स्थिति बदलती रही।

सुप्रीम कोर्ट की भूमिका और 133 नियुक्तियां

इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी हस्तक्षेप किया था और 133 अभ्यर्थियों को मेडिकल फिटनेस के आधार पर नियुक्ति देने का आदेश दिया था।

इन्हीं आदेशों के आधार पर उनकी बहाली की गई थी, लेकिन बाकी अभ्यर्थियों ने इसी आधार पर समानता का दावा करते हुए नियुक्ति की मांग की थी।

हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भर्ती प्रक्रिया वर्ष 2023-24 में समाप्त हो चुकी है, ऐसे में अब उसमें हस्तक्षेप करना उचित नहीं है।

कोर्ट ने यह भी माना कि पुलिस विभाग का यह तर्क सही है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश केवल विशेष श्रेणी के अभ्यर्थियों पर लागू था।

निष्कर्ष

पटना हाईकोर्ट के इस फैसले से 283 अभ्यर्थियों को बड़ा झटका लगा है और दारोगा भर्ती विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। यह मामला अब कानूनी दृष्टि से लगभग अंतिम चरण में माना जा रहा है, क्योंकि कोर्ट ने एकलपीठ का आदेश पूरी तरह निरस्त कर दिया है।

न्यायालय का यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि समानता का अधिकार हर स्थिति में समान परिणाम नहीं दे सकता। भर्ती प्रक्रिया में कानूनी स्पष्टता और पारदर्शिता जरूरी है, ताकि भविष्य में ऐसे विवाद न उत्पन्न हों और अभ्यर्थियों का भरोसा व्यवस्था पर बना रहे।

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