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Bihar Politics: फरक्का संधि पर संजय झा का RJD पर हमला, पूछा- 1996 में बिहार में किसकी सरकार थी?

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | फरक्का संधि को लेकर संजय झा ने RJD पर निशाना साधा और 1996 के समझौते पर सवाल उठाए। छात्र आंदोलन और महिला सशक्तिकरण पर भी बयान दिया।

पटना, 26 अगस्त। फरक्का समझौते को लेकर बिहार की राजनीति में एक बार फिर बयानबाजी तेज हो गई है। जेडीयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद संजय झा ने राष्ट्रीय जनता दल पर निशाना साधते हुए 1996 में हुए फरक्का समझौते को लेकर विपक्ष से जवाब मांगा है। उन्होंने कहा कि आज आरजेडी के नेता इस मुद्दे पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन उन्हें पहले यह बताना चाहिए कि समझौते के समय बिहार में किस दल की सरकार थी और मुख्यमंत्री कौन थे।

संजय झा का यह बयान ऐसे समय आया है, जब फरक्का बैराज और गंगा के पानी के बंटवारे को लेकर बिहार में राजनीतिक चर्चा फिर तेज हुई है। जेडीयू नेता ने साफ कहा कि उनकी पार्टी फरक्का समझौते के मौजूदा स्वरूप को बिहार के हित में नहीं मानती।

1996 के समझौते पर RJD से सवाल

संजय झा ने अपने बयान में 1996 के भारत-बांग्लादेश फरक्का जल बंटवारा समझौते का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उस समय 30 साल की अवधि के लिए समझौता हुआ था। अब इस मुद्दे पर विपक्ष की ओर से सवाल उठाए जाने पर उन्होंने पुराने राजनीतिक घटनाक्रम की ओर ध्यान दिलाया।

उनका सवाल सीधे आरजेडी की ओर था कि जिस समय यह समझौता हुआ, उस समय बिहार में किसकी सरकार थी और राज्य की सत्ता किसके हाथ में थी।

जेडीयू नेता ने कहा कि किसी पुराने समझौते पर वर्तमान में राजनीतिक भाषण देने से पहले उस समय की परिस्थितियों और तत्कालीन सरकार की भूमिका पर भी चर्चा होनी चाहिए।

'मौजूदा स्वरूप के खिलाफ JDU'

फरक्का समझौते पर जेडीयू का रुख बताते हुए संजय झा ने कहा कि उनकी पार्टी इसके मौजूदा स्वरूप को आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं है। उन्होंने दावा किया कि केंद्र सरकार के सामने भी इस समझौते को आगे नहीं बढ़ाने की बात रखी गई है।

उनका आरोप है कि फरक्का समझौते के कारण बिहार को नुकसान उठाना पड़ा है। खासकर गंगा के जलप्रवाह, गाद और बाढ़ जैसी समस्याओं के संदर्भ में बिहार लंबे समय से अपनी चिंता जताता रहा है।

संजय झा ने आरजेडी पर तंज कसते हुए कहा कि अब केवल बयान देने या प्रवचन करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उनके मुताबिक, इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों को पुराने फैसलों की जिम्मेदारी और वर्तमान स्थिति दोनों पर बात करनी चाहिए।

फरक्का पर फिर आमने-सामने बिहार की पार्टियां

फरक्का का मुद्दा बिहार के लिए लंबे समय से संवेदनशील रहा है। राज्य में गंगा और उसकी सहायक नदियों के जलप्रवाह, बाढ़ तथा नदी में जमा होने वाली गाद को लेकर समय-समय पर राजनीतिक दल केंद्र सरकार से कदम उठाने की मांग करते रहे हैं।

अब संजय झा के बयान के बाद इस मुद्दे पर जेडीयू और आरजेडी के बीच राजनीतिक टकराव बढ़ने की संभावना है। खास बात यह है कि हमला केवल मौजूदा नीति पर नहीं बल्कि 1996 के राजनीतिक फैसले को लेकर भी किया गया है।

छात्र आंदोलन पर भी बोले संजय झा

संजय झा ने पटना में चल रहे छात्र आंदोलन पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि छात्रों की अपनी समस्याएं हैं और सरकार उनकी बात सुन रही है। सरकार उनकी मांगों पर विचार कर रही है और उचित समय पर फैसला लिया जाएगा।

उन्होंने विपक्ष पर छात्रों के मुद्दे को राजनीतिक रंग देने का आरोप भी लगाया। जेडीयू नेता के मुताबिक, सरकार छात्रों की समस्याओं के समाधान की दिशा में काम कर रही है और आंदोलन को लेकर सरकार का रुख संवाद और समाधान का है।

वहीं, छात्रों की ओर से भर्ती परीक्षाओं और रोजगार से जुड़े मुद्दों को लेकर लगातार प्रदर्शन किया जा रहा है। ऐसे में सरकार की ओर से आने वाले फैसलों पर छात्रों की नजर बनी हुई है।

तेजस्वी यादव के आरोपों पर पलटवार

छात्र आंदोलन को लेकर नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की ओर से सरकार पर लगाए गए आरोपों का भी संजय झा ने जवाब दिया। तेजस्वी यादव सरकार को 'लाठी मार सरकार' जैसे शब्दों से घेर रहे हैं।

संजय झा ने पलटवार करते हुए कहा कि अगर सरकार छात्रों की बात नहीं सुने तो विपक्ष सवाल उठाता है और जब सरकार उनकी समस्याएं सुन रही है, तब भी आरोप लगाए जा रहे हैं।

उनके बयान से साफ संकेत मिला कि सत्तापक्ष छात्र आंदोलन को लेकर विपक्ष के हमलों का राजनीतिक जवाब देने की तैयारी में है।

महिलाओं के मुद्दे पर भी बड़ा दावा

संजय झा ने महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर भी सरकार की उपलब्धियां गिनाईं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार महिलाओं के लिए तीन बड़े तोहफे देने जा रही है।

उन्होंने कहा कि बिहार में महिलाओं के लिए किए गए काम का इतिहास लिखा जाएगा और मौजूदा सरकार भी महिलाओं के हित में उसी दिशा को आगे बढ़ा रही है।

हालांकि, उन्होंने जिन तीन प्रस्तावित तोहफों का जिक्र किया, उनके बारे में विस्तृत जानकारी सामने नहीं रखी। ऐसे में अब निगाह सरकार की ओर से होने वाली आधिकारिक घोषणा पर रहेगी।

तीनों मुद्दों पर सियासी संदेश

संजय झा के बयान में तीन अलग-अलग मुद्दे एक साथ दिखाई दिए—फरक्का समझौता, छात्र आंदोलन और महिला सशक्तिकरण। तीनों ही मुद्दे बिहार की मौजूदा राजनीति में महत्वपूर्ण हैं।

फरक्का को लेकर उन्होंने सीधे आरजेडी के पुराने शासनकाल को निशाने पर लिया। छात्र आंदोलन पर सरकार का बचाव किया और महिलाओं के मुद्दे पर सरकार की आगामी योजनाओं का संकेत दिया।

इससे यह भी साफ है कि सत्तारूढ़ गठबंधन विपक्ष के हमलों का जवाब अलग-अलग मुद्दों पर राजनीतिक तरीके से देने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है।

अब RJD के जवाब पर नजर

संजय झा के 1996 के समझौते वाले सवाल के बाद अब राजनीतिक नजर आरजेडी की प्रतिक्रिया पर टिक गई है। आरजेडी इस मुद्दे पर क्या जवाब देती है और उस समय की सरकार की भूमिका को लेकर क्या पक्ष रखती है, यह आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है।

फिलहाल फरक्का संधि एक बार फिर बिहार की सियासत में लौट आई है। एक तरफ जेडीयू इसे बिहार के हित से जोड़कर पुराने समझौते पर सवाल उठा रही है, वहीं विपक्ष की ओर से सरकार के मौजूदा रुख और नीतियों पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

आने वाले दिनों में यदि केंद्र और राज्य सरकार की ओर से फरक्का समझौते को लेकर कोई ठोस पहल या बयान सामने आता है तो यह मुद्दा और बड़ा राजनीतिक रूप ले सकता है।

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फरक्का पर राजनीति से आगे समाधान की जरूरत

फरक्का समझौते को लेकर बिहार में राजनीतिक बहस नई नहीं है। गंगा के जलप्रवाह, बाढ़ और गाद की समस्या राज्य के लिए वास्तविक चिंता का विषय रही है। इसलिए इस मुद्दे को केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रखने के बजाय बिहार के हित में ठोस नीति और वैज्ञानिक समाधान पर चर्चा जरूरी है।

संजय झा ने 1996 के समझौते को लेकर आरजेडी से सवाल किया है। यह राजनीतिक रूप से स्वाभाविक हमला है, लेकिन बिहार की जनता के लिए इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आज की तारीख में राज्य को फरक्का से जुड़ी समस्याओं से कैसे राहत मिलेगी।

अगर राज्य सरकार मौजूदा समझौते को बिहार के हित में नहीं मानती है तो उसे केंद्र के साथ बातचीत के जरिए ठोस विकल्प सामने रखने होंगे। इसी तरह विपक्ष को भी केवल राजनीतिक बयान देने के बजाय अपने पुराने फैसलों और उस समय की परिस्थितियों पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए।

छात्र आंदोलन और महिला सशक्तिकरण के मुद्दे भी सरकार के लिए महत्वपूर्ण हैं। छात्रों की मांगों का समयबद्ध समाधान और महिलाओं के लिए घोषित योजनाओं की स्पष्ट जानकारी सरकार के प्रति भरोसा मजबूत कर सकती है।

अब आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि फरक्का के मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी कितनी आगे जाती है और क्या इसके साथ कोई ठोस पहल भी सामने आती है।

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