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Patna News: 102 साल की उम्र में स्वतंत्रता सेनानी जगदीश सिंह का निधन, 1942 की लड़ाई की यादें हुईं ताजा

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | बिहटा के दिलावरपुर निवासी स्वतंत्रता सेनानी जगदीश सिंह का 102 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। 1942 के आंदोलन और अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचार की उनकी कहानी आज भी प्रेरणा देती है।

 स्वतंत्रता आंदोलन के एक ऐसे साक्षी को खो दिया, जिसकी जिंदगी देश की आजादी की लड़ाई से जुड़ी यादों का जीवंत दस्तावेज थी। गांव निवासी स्वतंत्रता सेनानी जगदीश सिंह का 102 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके जाने की खबर फैलते ही दिलावरपुर सहित आसपास के इलाकों में शोक की लहर दौड़ गई। स्थानीय लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उनके साथ स्वतंत्रता संग्राम के दौर की कई प्रत्यक्ष स्मृतियां भी हमेशा के लिए खामोश हो गईं।

जगदीश सिंह का जन्म वर्ष 1924 में हुआ था। उनका जीवन उस दौर में शुरू हुआ, जब देश अंग्रेजी शासन के अधीन था और आजादी की मांग धीरे-धीरे जनआंदोलन का रूप ले रही थी। बेहद कम उम्र में विवाह के बाद उन्होंने अपने चाचा शिव सिंह उर्फ सिपाही सिंह के साथ स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू किया।

11 साल की उम्र में हुई थी शादी

जगदीश सिंह की जिंदगी का एक पहलू यह भी है कि उनकी शादी महज 11 वर्ष की उम्र में नत्थूपुर निवासी 12 वर्षीय फूलमती देवी से कर दी गई थी। बाद में यही फूलमती देवी उनके संघर्षपूर्ण जीवन की साथी बनीं।

देश में स्वतंत्रता आंदोलन तेज होने लगा तो जगदीश सिंह भी उससे जुड़ गए। उनके जीवन की सबसे चर्चित घटनाओं में 1942 का वह दौर शामिल है, जब अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन अपने निर्णायक चरण में पहुंच रहा था।

1942 में ट्रेन रोकने की बनी थी योजना

जगदीश सिंह ने अपने जीवनकाल में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी घटनाओं को याद करते हुए बताया था कि वर्ष 1942 में कौड़िया-पाली स्थित उनके पैतृक आवास पर आंदोलन से जुड़े लोगों की बैठक हुई थी। इसी दौरान बिहटा स्टेशन से अंग्रेजों के लिए खाद्य सामग्री और हथियार लेकर गुजरने वाली ट्रेन को रोकने की योजना बनाई गई थी।

योजना के मुताबिक ट्रेन को रोका गया और उसमें मौजूद खाद्य सामग्री बाहर निकाल ली गई। इसमें चीनी, आटा, सूजी, दूध, घी समेत कई सामान शामिल थे। यह घटना उस दौर में अंग्रेजी शासन के खिलाफ स्थानीय स्तर पर चल रहे प्रतिरोध की तस्वीर पेश करती है।

गिरफ्तारी से बचने के लिए जंगल और पेड़ों का सहारा

ट्रेन रोकने की घटना के बाद अंग्रेजी फौज ने इलाके में तलाशी और घेराबंदी शुरू कर दी थी। आंदोलन से जुड़े कई ग्रामीण गिरफ्तारी से बचने के लिए गांव छोड़कर जंगल की ओर निकल गए।

जगदीश सिंह के मुताबिक, कई लोगों ने पेड़ों पर छिपकर दो दिन और दो रात गुजारे। इसी दौरान लगातार बारिश ने अंग्रेजी सैनिकों के अभियान को मुश्किल बना दिया और आंदोलनकारियों को बच निकलने का मौका मिला।

उस दौर की कल्पना आज करना मुश्किल है, लेकिन आजादी की लड़ाई में शामिल लोगों के लिए गिरफ्तारी, मारपीट और जान का खतरा रोजमर्रा की वास्तविकता थी।

जब जगदीश की तलाश में घर पहुंच गए अंग्रेज

ट्रेन की घटना के बाद अंग्रेजी अफसर जगदीश सिंह को पकड़ने के लिए उनके घर तक पहुंचे थे। उस समय घर में उनकी पत्नी फूलमती देवी मौजूद थीं।

अंग्रेजों ने जगदीश सिंह के बारे में पूछताछ की। रिपोर्ट के अनुसार, बातचीत के दौरान उन्होंने अभद्रता की तो फूलमती देवी ने विरोध किया। उन्होंने घर में रखी तलवार उठा ली। इसके बाद एक अंग्रेज ने तलवार छीनकर राइफल के कुंदे से उनके हाथ पर वार कर दिया, जिससे उनका हाथ टूट गया था।

फूलमती देवी ने भी झेला था अंग्रेजी हुकूमत का जुल्म

इस घटना के बाद फूलमती देवी को इलाज के लिए तत्काल कोई चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध नहीं थी। उन्होंने खुद ही हल्दी का लेप लगाकर बांस की कवाची के सहारे घायल हाथ को बांधा था।

जगदीश सिंह और फूलमती देवी की कहानी सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी की कहानी नहीं है, बल्कि उस परिवार की कहानी है जिसने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष की कीमत अपने शरीर और जीवन से चुकाई। 2025 में प्रकाशित एक विस्तृत रिपोर्ट में भी दोनों के संघर्ष और अंग्रेजी दमन की घटनाओं का उल्लेख किया गया था।

परिवार में तीन बेटे, अलग-अलग क्षेत्रों में रहे सक्रिय

जगदीश सिंह अपने पीछे तीन बेटों का परिवार छोड़ गए हैं। उनके बड़े पुत्र सुदर्शन सिंह सीआरपीएफ में इंस्पेक्टर पद से सेवानिवृत्त हुए। दूसरे पुत्र बिजेंद्र सिंह खेती से जुड़े रहे, जबकि तीसरे पुत्र अशोक सिंह वाहन कारोबार से जुड़े हैं। परिवार की अगली पीढ़ी भी अलग-अलग व्यवसायों में सक्रिय है।

गांव ने खोया आजादी की लड़ाई का जीवंत साक्षी

जगदीश सिंह के निधन के साथ एक ऐसी पीढ़ी का एक और चेहरा इतिहास बन गया, जिसने अंग्रेजी शासन को किताबों में नहीं बल्कि अपनी आंखों के सामने देखा था। उन्होंने आंदोलन में भाग लिया, अंग्रेजी कार्रवाई का सामना किया और अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक उस दौर की घटनाओं को याद रखा।

उनकी कहानी यह भी बताती है कि स्वतंत्रता आंदोलन केवल बड़े शहरों या प्रसिद्ध नेताओं तक सीमित नहीं था। बिहार के गांवों और कस्बों में भी आम लोगों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ प्रतिरोध में हिस्सा लिया था।

जगदीश सिंह के निधन से दिलावरपुर और बिहटा क्षेत्र में शोक का माहौल है। स्थानीय लोगों ने उनके योगदान को याद करते हुए श्रद्धांजलि दी और कहा कि उनकी संघर्षगाथा आने वाली पीढ़ियों को आजादी की कीमत समझने की प्रेरणा देती रहेगी।

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इतिहास के आखिरी गवाहों को सहेजना जरूरी

स्वतंत्रता सेनानी जगदीश सिंह का निधन केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है, बल्कि उस पीढ़ी से विदाई है जिसने भारत की आजादी का संघर्ष अपनी आंखों से देखा और झेला। आजादी के 80 वर्ष के करीब पहुंच चुके देश में ऐसे लोगों की संख्या लगातार कम हो रही है, जिनके पास स्वतंत्रता आंदोलन के प्रत्यक्ष अनुभव मौजूद हैं।

जगदीश सिंह की कहानी खास इसलिए है क्योंकि इसमें आंदोलन, ग्रामीण प्रतिरोध, अंग्रेजी दमन और एक परिवार के संघर्ष—चारों पहलू एक साथ दिखाई देते हैं। 1942 की घटनाओं को उन्होंने अपने अनुभवों के रूप में साझा किया था। ऐसी मौखिक इतिहास की स्मृतियों को दस्तावेज के रूप में सुरक्षित करना समय की जरूरत है।

आज की पीढ़ी के लिए स्वतंत्रता सिर्फ एक संवैधानिक अधिकार है, लेकिन उस अधिकार के पीछे लाखों लोगों का संघर्ष छिपा है। जगदीश सिंह जैसे स्थानीय योद्धाओं की स्मृतियां हमें याद दिलाती हैं कि आजादी की लड़ाई गांव-गांव तक पहुंची थी। इसलिए उनके जीवन और संघर्ष को केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना भी समाज की जिम्मेदारी है।

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